Tuesday, 7 October 2014

प्रनाली एक रँडी - जिसकी कहानी दर्दनाक नही थी....!!(7- Oct-2014)

 (चेतावनी - 25 वर्ष से कम उम्र  के लोगों के लिए उचित नही )

मुझे पसंद था हमेशा से लोगों के बारे में जानना , उन हालातों का विश्लेषण करना जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. आसान शब्दों में मुझे बुद्धिजीवीता प्रदर्शित करना पसंद था..क्योंकि वो मेरे अहम् को सुकून देता था... मुझे जो दूसरी चीज पसंद थी वो मेरे व्यक्त्तिव के अनुरूप तो नही थी पर बिना किसी कारण मुझे पसंद था "संभोग"..अथाह 'संभोग'...शरीर मेरे लिए भोजन से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था... किन्तु इस पर भी मेरे कुछ सिद्धांत थे...मैं विवाहित नही था..किंतु किसी महिला को प्रेम पाश में सिर्फ़ संभोग कि इच्छा के डाल देना मेरे लिए अनुचित था...मैंने कभी किसी शरीर को पाने के लिए प्रेम का सहारा नही लिया...ऐसा कुछ नही किया कि जिससे मेरी आत्मा जीवन भर ग्लानि में रहे !

अपनी आवश्यकताओं कि पूर्ति के लिए मैंने उस पेशे को चुना जो इस पृथ्वी पर सबसे प्राचीन था...मैंने वेश्याओं के पास जाना ज्यादा उचित समझा... उन लोगों को चुना जिन्हें पता था कि मुझे उनसे क्या चाहिए...मुझे उनके शरीर के सिवा उनसे कुछ नही चाहिए था, ये उन्हें भी पता था और मुझे भी...और उस पूर्ति के लिए मुझे एक कीमत चुकानी थी , जो मैं बिना टालमटोल चुकाता था... शरीर पे हक देने कि कीमत !


ये सब बिना रुके 2-3 साल चला इसी दौरान मैंने अपनी दोनों प्राथमिकताओं को जोड़ दिया ... मतलब, मैं हर उस रँडी के उस कारण को जान लेना चाहता था जिसके वजह से वो रँडी थी... मैं उन हालातों को जानना चाहता था जो रँडी के भीतर कि औरत को मार देता था...जो धकेल देता था उन्हें इस बाज़ार में जहाँ संवेदनाएँ बेतुकी थी , तुक था तो केवल शरीर का ! किसी औरत का दाम 300 था तो किसी का 30000 पर कहानी लगभग सबकी एक जैसी...संवेदनशील !


मैं रँडीओं के पास जाता , और घंटों उनसे बात करता ...एक चीज हर रँडी में सामान्य थी , वो थी उनकी अपनी कहानी सुनाने कि चाह..वो मुझे ऐसे अपनी कहानी सुनाती थी जैसे एक मासूम बच्चा अपने स्कूल कि हर एक बात स्कूल से आते ही अपनी माँ को सुनाता है.. किसी को उसके माँ बाप ने बेच दिया था , किसी को पति ने , किसी विधवा को अपने बच्चों को पालना था... एक और गलतफहमी दूर् होती चली गयीं...किसी भी रँडी का स्त्रीत्व मरा नही था , वो उतनी ही औरत थी जितनी एक सामान्य महिला...या शायद वो और ज्यादा औरत थी...इस पेशे ने उनका अपने अन्दर कि औरत से परिचय कराया था...उन्हें पता था वो क्या कर रही है ,सही क्या है ग़लत क्या है..पर हालात  उस सही ग़लत पे पारदर्शी परदा डाल देते थे।


ऐसे ही एक दिन मेरे जीवन में 'प्रनाली" का आगमन हुआ , उसके साथ 3 पहर बिताने के लिए 18000 चुकाने थे मुझे, दिवाली कि काली रात थी वो , रात 8 बजे के क़रीब उसने मेरे घर में कदम रखा. हर तरफ़ पटाखोँ का शोर था , कितु उसका आना हर विस्फोट से ज्यादा विस्फोटक था. उससे खूबसूरत महिला शायद ही कभी देखी हो मैंने, अगर स्वर्ग कि इंद्र्सभा में सचमुच मेनका , रंभा , उर्वशी ,होती होंगी तो 'प्रनाली" निष्चित उन्हीं में से किसी का पुनर्जन्म थी...उसके गुलाबी वस्त्र उसके परिपूर्ण वक्रोँ और उभारों को छुपा पाने में असमर्थ थे..रंग उसका दूध और कथ्थे से मिल के बना लगता था,उम्र कुछ 27-28 रही होगी.. न्यूनतम शृंगार उसे बाकी रंडियोँ से अलग परियोजित करता था.. तब मुझे ये नही पता था "प्रनाली" से मिलना किस सीमा तक मुझे कौंधाने  वाला है।


उस बला ने मेरी तरफ सूर्योदय की रफ्तार से आना शुरू किया , और मेरे  इतना नज़दीक आके की मैं उसकी गुनगुनी साँसे महसूस  कर सकता था , दो समानंतर प्रक्रियाएं  की।  पहली, खालिस अंग्रेजी में उसके गर्म शब्द मेरे कानों में पड़े , "So, From where to begin, Should i remove my cloths "? , और दूसरा, उसका बायाँ  हाथ अप्रत्याशित  रूप से मेरी जननेंद्रिय पे था।  एक पल लगा था उसे मेरे  लिए एक प्रश्नचिन्ह बनने में , कहाँ थी वो नाममात्र की हया जो आजतक हर रंडी में  ढूंढ निकाली  थी मैंने। उसकी हरकत उसके शब्दों का प्रसार ही तो थी , उसे पता था की वो वहां उस बंद कमरे में क्यों थी , उसे पता था उसे इतने पैसे  क्यों  दिए जाते हैं।  उसके आने के चंद क्षणों में इतना तो जान चुका था आज एक नयी तरह की  औरत से परिचय हुआ था मेरा।  मेरे दिमाग़ ने आदतानुसार न जाने कितने विश्लेषण कर डाले थे।  और उस सारे विश्लेषण के वक़्त उसकी नाज़ुक उंगलिओं ने मेरे लिंग को जकड़े  रखा था , और एक क्षण के लिए भी प्रनाली  के मुंह से रहस्मयी सम्मोहक मुस्कान गयी नहीं थी. उसकी आँखें मेरी आँखों से हटी नहीं थी , और मैं उसकी आँखों को चीर के उसके अंदर तक पहुँच जाना चाहता था , उसे पड़ना चाहता था , उत्सुकता से।  उससे ज्यादा पेशेवर रंडी से मेरा आज तक पाला नहीं पड़ा था। उसके साथ बिताया गया हर क्षण मुझे महसूस करवा रहा था की वो सबसे अलग थी.…सबसे अलग।  

हर क्षण उसे जानने की लालसा एक यंत्रणा लगने लगी मुझे, अभी भी मेरा पुरुषार्थ उसकी उँगलियों की कठपुतली बना हुआ था । ऐसे में उसने अगला कदम उठाया , और उसके होंठ मेरे होंठो को  छूने लगे।  उस क्षण  की मादकता ने मेरी उसे जानने की लालसा को दबाकर प्रनाली  को पूर्ण पाने की लालसा को सर्वोपरि  कर दिया। प्रनाली वो प्रक्रिया बनती जा रही थी मेरे लिए,  जो एक पुरुष को सम्पूर्ण बना देती है।  उसे पाने में कुछ वस्त्र बाधक थे , जिन्हे हम दोनों ने उतार फेंका।  इसी उठापठक में मेरा हाथ उसके स्तनों  पर पड़ा , ऐसा लगा हाथो में एक ऐसी गेंद दे दी गयी हो जिसे मैदे को मक्खन और दूध से  गूंदकर तैयार किया गया हो।  मैं प्रनाली से कुछ दूर हठा , ताकि उसे निहार पाऊँ। सच कहूँ तो मैं प्रनाली को टटोल टटोल के देख रहा था , की कही कुछ तो कृत्रिम निकले , पर ईश्वर शायद ही किसी कलाकृति को बनाने में इतना एकाग्र रहा होगा जितना इस मायाजाल को बनाने में।  लगा मानो भूत और वर्तमान के हर एक कवि की कविता जिसने किसी भी रूप में स्त्रीरूप की प्रशंसा की हो उसकी प्रेरणा सिर्फ प्रनाली ही होगी ।किसी औरत के कारण इतना कमज़ोर खुद को शायद ही महसूस किया था मैंने कभी।  मैंने अपने पौरष को इतना गर्वमयी कभी नहीं पाया था , इतना दृण संकल्पित.... मैं बिना कुछ बोले , समझे प्रनाली में समाता चला गया.… इतना वेगवान भी नहीं पाया था खुद को कभी मैंने …मुझे लगता था सहवास पुरुष प्रधान होता है , और स्त्री सहायक … पर इस सम्भोग गोष्ठी में खुद को बहुत असहाय , तुच्छ पा रहा था मैं.…और प्रनाली को सार्वलौकिक सत्य , वो ही उतपत्ति और वो ही निष्पत्ति।


उस सहवासीय प्रक्रिया को और अतुल्य बना रहा था , प्रनाली  का कामसूत्रीय ज्ञान। मानो सिर्फ उसी न सीखा हो कोकशास्त्र के हर पाठ का सटीक क्रियान्वयन।  कितना बौना महसूस कर रहा था उसके समक्ष मैं , मानो अम्लत्ताश को गुलाब की ख़ुश्बू आ जाये और हर एक पत्ता पेड़ से टूटकर , इच्छा मृत्य स्वीकार कर ले। उसे पुरुष शरीर के हर एक उस बिंदु का पता था , जहाँ छूने भर से पुरुष को एक ऐसा बन्दर बनाया जाया सकता था जिसे मदारी पलकों के इशारे पे नचा सकता हो.… प्रनाली वो मदारी ही थी और मैं उसका बन्दर , बन्दर अप्रिय न लगे अतः प्रनाली  का जमूरा तो मैं बन ही चुका था ।  


"तो मुझसे मेरी कहानी नहीं पूछोगे ? "प्रनाली  ने उस कामाग्नि के थोड़ा शीतल होने पे मुझसे पूछा।  "हम जैसियों से इसलिए तो मिलते हो न तुम ". मैं स्तब्धता के साथ ही आकलन करने लगा की क्या कहना चाहती थी वो।  'तो तुम जानती हो मुझे ", सिर्फ यही कह पाया था मैं।  'हाँ.…जानती हूँ मैं तुम्हे , तुम्हारे लिए रंडियाँ एक कहानी हैं बस। एक कहानी जो तुम हर बार , बार बार पड़ते हो.… हालंकि उस कहानी का अंत , शुरुआत , हर परिच्छेद, हर पंक्ति , हर शब्द पहले से जानते हो तुम।  बस हर बार चरित्रों के नाम बदल जाते हैं।  हैं न ????" मेरे मुंह से शब्द निकल रहे थे पर मष्तिष्क प्रनाली के हर शब्द के आकलन में  जुटा था , " नहीं गलत हो तुम मेरे लिए कहानी नहीं है , मैं उस दर्द को महसूस करना चाहता हूँ , जुड़ना चाहता हूँ , समझना चाहता हूँ , जो मार डालता है स्त्री के अंदर की  स्त्री को।  " 

"दर्द my foot".. एक पुरुष स्त्री को नहीं समझ सकता कभी , क्योंकि उसकी औकात ही नहीं होती। तुम केवल वो सुनना चाहते हो , समझना चाहते हो , जो बहुत obvious हो। By the way , मेरे बारे में क्या सोचते हो , क्या है मेरी कहानी ?" आखिरी पंक्ति  बोलते समय एक रहस्मयी मुस्कान देखी थी प्रनाली की आँखों में मैने। " वैसी ही है न तुम्हारी कहानी जैसी सबकी होती है , बस कुछ चरित्रों के नाम अलग होंगे।  या शायद कुछ ज्यादा सहा हो तुमने ज़िन्दगी को , शायद  बाकी सबसे थोड़ा ज्यादा।  है न ?" बड़ी विश्वश्ता  से पूछ बैठा था मैं। प्रश्न सुन ६-७ क्षण प्रनाली शांत थी उसकी आँखें सीधे मेरी आँखों में देख रही थी , चेहरे पर कोई भी भूला -भटका भी भाव नहीं था।  मुझे लगा था अब प्रनाली की आँखों से आंसू टपकने लगेंगे ,और फिर उन आंसूओं से भीगी कहानी प्रनाली को विषाद में  ले जायेगी।  पर उस ६-७ क्षण के बाद प्रनाली ने मेरे सारे कयासों को धता बता दिया। उसने बड़ी जोर का ठहाका लगाया था मुझ पे , मानो मेरा प्रश्न बुद्धिजीवी न होकर बालसुलभ हो।  मानो एक बालक अपनी माँ से पूछ बैठा हो , माँ अगली गर्मिओं के छुट्टीओं में "चंदा मामा " के यहाँ  चले क्या ? या  यूँ कहें , मैं कोई बेवकूफ था , और मुझे सारी दुनिया के सामने लज़्ज़ित करने के लिए मुझ पे हँसा जा रहा था।  इतना शर्मिंदा खुद को नहीं पाया था मैंने कभी।  एक वस्त्रहीन रंडी ने भाँड बना डाला था मुझे। 


"ठीक है सुनाती हूँ  मैं अपनी कहानी , शायद तुम्हे उतनी दिलचस्प न लगे, पर सिर्फ सच होगी", ठहाकों को रोकते हुए प्रनाली ने कहा मुझसे।  

अपनी निर्वस्त्रता छुपाने के लिए , पलंग की चादर खींच के मैं लकड़ी की कुर्सी पर  बैठ गया।और प्रनाली मेरे बिलकुल सामने पलंग पे बैठी थी उन्ही कपड़ो में जिनमे उसकी माँ ने उसे इस दुनिआ में धकेला था।  पहली बार  प्रनाली की उन आँखों में मैंने कुछ संवेदनाएं देखीं जो शायद अतीत को कहानी की शक्ल देने के प्रयास में लगीं थी। प्रनाली चिरपरिचित अंदाज़ में थोड़ा सा मुस्कुराकर बोली, "समझ नहीं आ रहा कहाँ से शुरू करूँ …OK...चलो शुरू से ही शुरू करती हूँ". मैं तैयार था प्रनाली को  चिरकाल तक सुनने के लिए।

"मेरा बचपन मेरे पिता के साथ कोलकता में गुजरा,मेरी माँ मुझे जन्म देते वक़्त गुज़र गयी थी।पापा की जान थी मैं,पापा ने कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी। पापा , मम्मी से बहुत प्यार करते थे, इसलिए उन्होंने दुबारा शादी भी नहीं की थी।हमारे दो कारखाने थे, जहाँ स्टील के ढाँचे बनते थे.एक बड़ा सा घर था , जिसमे ७-८ कमरे थे,जो मेरे और पापा के लिए जरुरत से ज्यादा थे।कमरों के आगे आँगन था और आँगन से थोड़ा हटके 1 कमरा था जहाँ हमारा ड्राइवर अमृत्य और उसकी पत्नी रंजिनी  रहते थे। रंजिनी तब २४ की रही होगी और अमृत्य ३१ का।  घर की और मेरी देखभाल रंजिनी ही करती थी। और बाहर के सारे काम अमृत्य किया करता था।रंजिनी  जिसे मैं प्यार से रंजू कहा करती थी ,दिनभर मुझे अपने और अमृत्य के प्यार के किस्से सुनाती थी।अमृत्य,रंजू को भगा के लाया था,और दोनों को एक बार देखते ही कोई भी कह सकता था की दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. 


वो बरसात की एक रात थी , मैं १३ साल की रही होउंगी तब।  रंजिनी मेरे साथ ही सोयी थी , अमृत्य को पापा ने किसी कारखाने के काम से लखनऊ भेजा था।  रंजिनी मेरे पास ही सो जाया करती थी जब भी अमृत्य को बाहर जाना पड़ता था।  रात को २ बजे के आसपास मेरी नींद खुली , रंजिनी वहां नहीं थी। मैं बाथरूम जाने  के लिए कमरे से  निकली, रंजिनी कहीं भी नहीं थी। और तब वो हुआ जो  शायद न हुआ तो मैं आज कुछ और होती।  मैंने रंजिनी के कराहने की आवाज़ सुनी , शायद वो  रो रही थी।आवाज़ पापा के कमरे से आ रही थी। दरवाज़ा बंद था , और जैसे जैसे मैं कमरे के नज़दीक पहुंची वो कराहना बढ़ता चला गया।  मैंने कुण्डी वाली जगह से अंदर झाँका, और कुछ ऐसा होता हुआ देखा जो पहले नहीं देखा था।हाँ मैंने पहली बार "SEX" देखा था।  रंजिनी , पापा के नीचे थी , दोनों बिना कपड़ो के थे. रंजिनी की दोनों टाँगे खुली थी और उनके बीच पापा थे।पापा के हाथ रंजिनी को नोच रहे थे, पर रंजिनी का कराहना दर्द के कारण नहीं था। वो कारण उस दिन मुझे समझ नहीं आया था।  मुझे समझ ये भी भी नहीं आ रहा था ,की मैं अब क्या करूँ।  मैं अगले आधे घंटे वहीँ खड़ी रही ,  तब तक , जब तक वो सब खत्म नहीं हुआ।  मैंने पहली बार किसी मर्द और औरत को बिना कपड़ो के देखा था।  मुझे पता नहीं था की मुझे क्या महसूस करना चाहिए. मैं रंजिनी के वपिस आने से पहले वपिस आके बिस्तर पे आँखें बंद करके लेट गयी.रंजिनी 15 मिनट बाद दबे पांव वपिस आयी,और आते ही सो गयी. 

मैं एक पल में बड़ी हो गयी थी ,कुछ दिन तक हर क्षण मेरे सामने केवल वो ही दृश्य रहे. जागते,सोते,ख्वाब में हर वक्त वही दृश्य .मेरे दिल में हर बीतते दिन के साथ अपने पिता से नफरत बढ रही थी, वो आदमी हर दिन रंजिनी को अपनी हवस का शिकार बना रहा था. रंजिनी को सब कुछ सहते हुए भी हर पल मुस्कुरना पड़ता था. जैसे कुछ हुआ ही ना हो. मुझे कुछ करना था , कुछ ऐसा जो मेरे पिता को एहसास दिलाये कि वो ग़लत कर रहे हैं. कुछ ऐसा जो रंजिनी को न्याय दिलाये. पापा का सामना  करने कि हिम्मत नही थी मुझमें,ना ही रंजिनी से बात करने कि. और क़रीब 8 महीने अपने मन में जलने के बाद मैंने एक निर्णय लिया . मुझे नही पता वो सही था या ग़लत पर वो मेरा ख़ुद का निर्णय था , और उसका असर जो भी हुआ उसकी जिम्मेदार में ख़ुद थी .मैंने निर्णय लिया कि पापा को भी वोही झेलना होगा , जो मैं झेल रही थी. मैंने अमृत्य के साथ "वो" करने का निश्चय लिया जो वो रंजिनी के साथ कर रहे थे. 






Continued....