Tuesday, 31 December 2013

जान की क़ीमत...!!!!(8/Oct/2002)

वह खड़ा था फिर,
देख रहा था टुकुर टुकुर ;
मगर कुछ समझ न आया ,
न समझ सकता ही था ;
बस,बस में देखना था ,
सो देखे जा रहा था ;
मेरे से पूछा  हिचकिचाकर ;
क्या है तथा क्यों है ;
जवाब न था मेरे पास ,
मिलके तीसरे से पूछा ,
उसका हाल था हमारे जैसा ;
एकत्र ७ लोग  हो चुके थे ,
कोई कुछ नहीं जानता था ;
२० मिनट बीते , मौका आगे जाने का मिला ,
देखा "१ सितारे " ने एक भिखारी को कुचल डाला था ;
वो कहता था मुझसे गिड़गिड़ाकर ,
"बाबूजी २ रुपये दे दो , बच्चे भूखे हैं ";
पता चला "सितारा" १९ लाख देगा ,
जान की कीमत १९ लाख ????
अच्छा है , अब बच्चो का पेट भर जाएगा।


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8-Oct-2002


Monday, 30 December 2013

कवि की आत्मा से साक्षात्कार....!!! (31-Jan-2002)

एक कवि  की आत्मा से साक्षात्कार हुआ ,
वो ढीठ बड़ी मुश्किल से इंटरव्यू हेतु तैयार हुआ ;
शुरूआत  हुई प्रश्न , उत्तर कि बरसात कि ;
अनुपम कि करतूतों और महोदय कि बात कि;
पहला प्रश्न उनकी कविता सम्बन्धी पूछा गया ,
प्रश्न सुन कवि ३ घंटे लगातार  रोता गया ;
रोने का कारण पूछने पर उत्तर कुछ इस प्रकार मिला। 
"मैं पहले वीर रस का कवि था ,
मगर वीरता कि कमी थी ,
सारी वीरता कहीं कोने में जमी थी ,
संपादक कविता सुन चपरासी को मेडिकल भिजवाते थे ,
ख़ास 5000 mg. कि डिस्प्रिन कि गोली मंगवाते थे ;
उसके बाद जाने का आदेश देते थे ,
बिना कहे ही एडवांस पकड़ा देते थे ;
मगर पत्रिका में से कविता नदारद हुआ करती थी ,
पैसे कि भरमार मगर शौहरत कि कमी हुआ करती थी ;
शौहरत के लिए सोचा क्यों न करुण रस अपनाया जाए ,
सारे देश को बाल्टियां भर भर के रुलाया जाया ;
ये सोच अपनी पहली करुण कविता अपने पुत्र को सुनायी ,
तो जनाब ने खिलखिलाकर हमारी खिल्ली उड़ाई ;
उसे बच्चा जान समझाया ,
"बेटे करुण रस कि कविता पे हँसते नहीं रोया करते हैं ,
साथ ही पिताजी कि इज़्ज़त का ख्याल रखा करते हैं ;"
जवाब मिला 
"आप छोटे से बच्चे कि भूख पर हमें रुलाना चाह रहें हैं ,
और इसे करुण रस कि कविता बता रहें हैं ,
देश कि ६०% जनता के भूखे रहने पे कोई नहीं रोया करता ,
हर बड़ा व्यक्ति उनकी दशा पे चद्दर तान के सोया करता ;
तो फिर तो ये बच्चा है , इसपर कौन रो सकता है ,
और जो रो सके क्या वो आपकी कविता पड़ सकता है "
छोटे से बच्चे ने हमारी गलती को पकड़वाया ,
साथ ही साथ करुण रस को बदलने का एहसास भी करवाया ;
तो जनाब हमने अब हास्य रस अपनाया ,
लेकिन साहब साल भर बाद सम्मलेन का नंबर आया ;
प्रथम नंबर हमारा था , सारे श्रोतागण उत्तेजित थे ,
हास्य रस के फन में अभी तो हम नवोदित थे ;
कविता से पहले मुख्य अतिथि ने अपना इंट्रोडक्शन करवाया ,
अपने आप को अंडरवर्ल्ड डॉन के नाम से पहचानवाया ;
तो साहब हमें बुलवाया गया ,
तथा मुख्य अतिथि को खुश करने को बतलाया गया ;
बेकार कविता पे दो कारतूस का इनाम था ,
इसलिए पंडित , मुल्ला , पादरी का ख़ास इंतज़ाम था ;
तो हमने कविता सुनाना शुरू किया ,
दुर्भाग्य कि प्रथम पंक्ति में ही पुलिस का नाम लिया ,
पुलिस का नाम सुनते ही मुख्य अतिथि ने इनाम दिलवाया ;
तथा हमारा मेल परमात्मा से कराया ;
तब से भूत बना फिर रहा हूँ , अगले जन्म कि प्यास में ,
यमराज के पास ही रहता हूँ , कविता सुनाने कि आस में ;
यहाँ कविता सुना सकता हूँ ,क्योंकि किसी के सिरदर्द नहीं होता,
छोटा हो या बड़ा कोई भूखा नहीं सोता ;
कोई डॉन नहीं होता मुख्यअतिथि के रूप में ;
और इनाम के रूप में गोली नहीं मिलती ;
मैं उत्तर में खोया था , कि महोदय का मोबाइल झन्नाया,
तथा उन्हें तुरंत कवि सम्मलेन में पहुँचने का आदेश आया ;
यमराज के साथ उनकी मिसेज़ आ रहीं  थीं ,
और बगल से ही सम्मलेन तक कि  बस भी  जा रही थी ;
महोदय झट से बस में सवार हो गए ,
बिना रस कि कविता सुनाने हेतु बेकरार हो गए ;
हमने भी उनसे विदा ली , अगली भेंट तक ,
तथा उनके जीवन पे विचार किया बड़ी देर तक ;
हम भी घर आ गए दूसरी बस पकड़कर ,
आंसू आ गए संपादक के इंटरव्यू पड़कर !!!



अनुपम S "श्लोक "
31-Jan-2002
anupamism@gmail.com


Saturday, 28 December 2013

अजी खुश हूँ बहुत....!!!( 28/Dec/2013)

सपनो के जजीरे का पंछी......!!! (28/Dec/2013)

अनदेखे सपनो के जज़ीरों पे एक पंछी आ बैठा,
जाना सा , पहचाना सा , सफेद पंखो वाला।
जजीरे के चारों तरफ पानियों कि भरमार ,
वो पगला सा , चोंच से नमकीन पानी चुनता।
उसी जजीरे के एक कोने पे छोटा सा घर था मेरा ,
याद तो होगा न , सपनो का सौदागर था मैं.
उस दिन उड़ते उड़ते आया ,बिना बताये  दबे पांव,
मेरे आँगन में दबी  कुछ , चने कि दाल चुराने।
उसे लगा कि मुझे पता नहीं कुछ ,
देख तो लिया था  मैंने उसे , पर  बोला नहीं कुछ।
मुझे ऐसा लगा कोई सिद्ध ब्राह्मण आया है , भोज करने।
आखिरकार मैंने आवाज़ लगायी कर्कश सी कि ," कौन है वहाँ"?
उसे डराने के लिए नहीं , लजाने के लिए ;
उसने उड़ना  तो बहुत चाहा होगा ,पंछी ही था आखिर ,
पर मेरी आवाज़ कि सच्चाई ने नहीं उड़ने दिया उसे।
मैंने भीतर से कुछ और दाल लाकर देदी उसे,
दोस्त बन गए हैम दोनों , पक्के दोस्त ;
रोज़ आता था वो , और कुछ मीठा सा गाना सुना जाया करता था।
 तब तक चला ये , जिस दिन तक मुझे राजा के महल न जाना पड़ा।
जब वापिस आया मैं , नहीं पाया उसे कभी भी मेरे घर में ,
 महीनो बीते , याद आती थी मुझे उसकी कभी कभार ;
एक दिन उसका एक पंख मिला मुझे,
मेरी घर के पिछवाड़े जहाँ  पालतू बिल्ली रहती थी मेरी।


अनुपम S "श्लोक"
28/Dec/2013
anupamism@gmail.com

Tuesday, 24 December 2013

आखिर किसने ???? ( 8/Apr/2008)

किसने  तुम्हे हक़ दिया मेरी  ज़िन्दगी से खेलने का ?
क्या हक़ है तुम्हे इतना खूबसूरत लगने का ?
क्यों मैं बार बार तुम्ही  को याद करता हूँ , तुम्ही को सोचता हूँ ?
क्यों मेरी आखें सिर्फ तुम्ही को देखना चाहती हैं ?
क्यों मेरे लब केवल तुम्हारा ही नाम लेना चाहते हैं ?
क्यों आखिर क्यों मैं ऐसा  हो गया हूँ ?


शायद कुछ चीज़ें मेरे रुबरु ही नहीं होना चाहतीं,
पर तुम एक चीज़ तो नहीं ,
तुम एक एहसास हो जिंदगी भर के लिए ,
एक एहसास जो तन बदन और साँसों तक में बस चुका है।
जब भी तुम्हे मेरे प्राणों कि आवश्यकता पड़े ,
आना और नि:संकोच मांग लेना।


अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com




याद ....!!! (6/Apr/2008)

तुम मुझसे  दूर हो सकते हो , मेरी यादों से नहीं।

क्योंकि जब जब मेरी साँसे चलेंगी,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब मेरी आँखें कुछ देखेंगी,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब सागर में पानी बहेगा ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब ये धरती घूमेगी ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब घड़ी कि सुई हिलेगी ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब पेड़ो के पत्ते हिलेंगे,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब पक्षी चहचाहेंगे ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
और हाँ जब जब तुम मुझे याद नहीं करोगी।,
तब तब मैं तुम्हे याद करूँगा।

अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com

कुछ ही पल...!!!(26-March-2008)



कैसे बदल जाती है ज़िन्दगी , सिर्फ कुछ  ही पलों में।
जो अपना हो , बेगाना हो जाता है। 
जो नया था , वो पुराना कहलाता है। 
क्यों साथ ,जुदाई बन जाता  है। 
क्यों दिन रात में डूब जाता है। 
क्यों प्यार एक किस्सा बन के रह जाता है। 
क्यों जो करीब था वो , दूर हो जाता है। 
कैसे पत्थर देवता हो जाता है। 
क्यों मेरी साँसे मेरा दम घोटने लगती है। 
क्यों मेरी परछाई मुझसे दूर भागना चाहती  है। 
क्यों मेरी नींद मुझसे आँख चुराती है। 
क्यों मेरी आँखें अब सपने नहीं दिखाती हैं,

समझना चाहता हूँ मगर समझ नहीं आता है ,
क्या क्या हुआ और क्या क्या हो जाता है। 

सिर्फ कुछ ही पलों मैं.… 
सिर्फ कुछ ही पलों मैं.… 
सिर्फ कुछ ही पलों मैं.… 


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com 

मैं आज फिर तनहा हूँ...!! (27-Aug-2008)

मैं आज फिर तनहा हूँ...!!
क्या यही माँगा था मैंने ज़िन्दगी से ?
मैंने तो बस आराम चाहा था , तन्हाई नहीं।
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??

उन आँखों में घंटो देखता था।,
मेरी ज़िन्दगी केवल ढाई इंच आँखें थी।
लेकिन उन आँखों ने क्या माँगा होगा ?
मेरा साथ ही माँगा होगा शायद।
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??

वो रातें , दोस्तों के साथ बीतती थी ,
वो बातें , गम ख़ुशी बांटती थी। 
वो शामें घूमने को होती थी। 
क्या वो मुझसे  दूर जा सकते थे ?? नहीं। 
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??

जिंदगी बदल गयी है , मैं बदल गया हूँ। 
राहें बदल गयीं हैं मैं बदल गया हूँ। 
सोच बदल गयी है , मैं बदल गया हूँ 
विश्वास बदल गए हैं , मैं बदल गया हूँ। 
और सच सिर्फ ये कि …… 
मैं आज फिर तनहा हूँ...!!


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com



वो मिला मुझे कल ....!!! (23- Dec-2008)

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो ज़िन्दगी का इंतज़ार कर  था ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था।

वो बैठा रहा , मैं सोचता रहा ,
क्या कोई ऐसा भी हो सकता है ?
वो खुद एक दुनिया , और दुनिया जिसका ख्वाब ,
वो जो कई कायनातों के बाद आया है।
वो जो जिंदगी का बनके ख्वाब आया है।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ।
मैं गया उसके पास, वो लम्हा था १ ख़ास।
क्योंकि मैं ज़िन्दगी से बचना चाहता था ,
और वो ज़िन्दगी को बचाना चाहता था।
उसके लिए गुरु ही ब्रह्मा , और मेरे लिए अहं ब्रह्मास्मि।
एक क्षण को देखा उसने ,और फिर नज़रें झुका ली।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो शायद चाँद सा रौशन , या हज़ार चांदो का चाँद।
वो गुलाब कि खुशबू , या खुद एक गुलाब।
वो माला का मोती , वो आफ़ताबो  मेहताब।
वो हवा का संगीत , वो भंवरे का ख्वाब।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो ज़िन्दगी का इंतज़ार कर  था ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था। 



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com 



Wednesday, 18 December 2013

कहाँ गया पाप ??? (29 - 10 - 2004)

मेरा नाम अनुपम है तो सोचा न, क्यों न नामनुसार कुछ अनुपम कार्य किया जाए ,
कुछ  ख़ास तो करने को है नहीं  ख़ाली समय में  कुछ खोज  कि जाए. 
तो यही सोच ,  सोचने लगा कोई प्रश्न , जो अनुत्तरित हो असोचा हो ;
सोचता रहा आखिर क्या अनुत्तरित है अब तक जग में ?

७२ घंटो के बाद दो  प्रश्न सामने थे?
प्रथम , आखिर मानव मृत्य पश्चात कहाँ जाता है ?
ईश्वर को प्राप्त करता है , या मिट्टी  में मिल जाता है ?
दूसरा , आखिर सदियों से करोडो मानवो ने गंगा में अपने पाप धोये ,
लेकिन सारा पाप गया कहाँ??

प्रथम उत्तर प्राप्त करने हेतु मरना जरुरी था ,
अतः दूसरे को प्रथम मानकर जा पहुंचा हरिद्वार।

कुछ भैंसे किनारे पर नहा रही थीं ,
कुछ स्त्रियाँ दीपक बहा रही थीं। 
कुछ "फ़ूल" जो तैर रहे थे ,
और कुछ "फूल" जो डूब जाने थे।  
ऐसा था कुछ गंगा का हाल। 

ऐसी स्थिति को अनदेखा कर पुकारा… 
" हे गंगे प्रकट हो !!"
आश्चर्य ! प्रथम पुकार में ही गंगा समक्ष थी.
मैंने कुछ क्षण अपलक देखा फिर पूछा।  

"हे गंगे मैं कोई पुण्यात्मा नहीं ,फिर इतनी शीघ्र  क्यों  दर्शन दिए  ?"
उत्तर मिला " पुत्र हज़ारों वर्ष बीत  गए, कोई  कहता है ,
धन दो , कोई कहता है संतान दो;
पर कोई भी प्रकट होने को नहीं कहता ,
तुमने कहा तो मैं खुद को रोक नहीं पायी। "
"बोलो तुम्हारा  स्वार्थ क्या है "?

मैं बोला "माता मैं दुविधा में स्वयं को पाता हूँ,
अथक प्रयासों बाद भी एक उत्तर नहीं पाता हूँ

आखिर तुमसे ही पूछने चला आया हूँ , कृपया उत्तर दो।

बताओ "सदियां बीती ,  बीते युग भी , बीते कल्प हज़ार ,
किन्तु रहा ये प्रश्न अनुत्तरित ,  अनुपम सदाबहार  .

"पापी भीष्म था, पापी भीम भी ,
पापी दुर्योधन और कर्ण ,
पापी कुंती  और द्रौपदी ,
पापी कहीं कृष्ण का प्रण ,
पापी साधु , मुनि , ऋषि ,
और पापी राजा प्रत्येक ;
पापी लालू, पापी सोनिया ;
अडवाणी अटल समेत ;
पापी मैं और तुम भी हो,
फिर कौन रहा है बाकी ,
किन्तु एक बात समझ न आती ;
तुझमें जो नहा गया ,
वो पा गया पापों से मुक्ति,
चाहे हो कोई ईश पुजारी ,
या न जाने वो भक्ति ,
फिर भी आते हैं , नहाते हैं ,
और अपना पाप छोड़ जाते हैं ,
तो बताओ…

जब लाखों नहा गए , तो पाप समतुल्य ही होगा
खरबो न हो , अरबों में ही , टनों पाप तो होगा ;
किन्तु आज भी लोग आते हैं ,
नहाते हैं , और पाप छोड़ जाते हैं ;
तो बताओ , इतना पाप गया कहाँ ??"

गंगे हंसी और बोली ,
"बेटा प्रश्न तेरा महान है ,
पर मैं असमर्थ बताने में,
लोग लगे थे नहाने में
और मैं आगे सरकाने में ;

अर्थात "मैं एक ओर से पाप लेती हूँ ,
और दूसरी और से समुद्र को दे देती हूँ ;
अतः ये प्रश्न समुद्र से पूछो कि ,कहाँ गया वो पाप ?
वही संचित स्थल का नाम बता पायेगा ,
और साथ ही मुझे भी सूचित करवाएगा ;

तो  मैं पहुंचा सिंधु समीप , लेकर प्रश्न विकराल ,
दी आवाज़ प्रकट हो सागर , तू वृहद् , दीर्घ , विशाल                                        
शीघ्र समक्ष सागर को पाकर , प्रश्न शीघ्र ही पूछा
सुना प्रश्न को , सोच विचारा , किया शीश को नीचा ;

वो बोला , " शर्मसार हूँ मैं , उत्तर मुझको भी न आता ,
जो पाप गंगे से मिलता , मैं भी आगे सरकाता ,
मैं तो जल के साथ पाप भी सूरज को पकड़ाता  हूँ ,
वाष्पीकृत रूप में ही , मैं पाप आगे ले जाता हूँ ;
अतः प्रश्न सूरज से पूछो , कहाँ गया वो पाप `
और  यदि उत्तर पाते हो , परम पूज्य हो आप ;


ले विदा  पुकारा सूरज को , वो प्रकट हुआ अतिशीघ्र,
बोला क्या चिंता औ इच्छा , हे मानव श्रेष्ठ अतिवीर !
मैं बोला , अनुपम हूँ मैं , और सूर्यदेव हो आप ;
कृपया उत्तर दो हे देव , कहाँ गया वो पाप;
कहाँ गया वो पाप , जो गंगा ने थोक मे पाया ;
फिर समुन्द्र ने पाकर उससे , तुम्हें अधिपति बनाया ;


बोला सूर्य " जो दिया सिंधु ने , पाप  कलंकित काला ,
वो समस्त पाप मैंने बादल को दे डाला।
उससे ही पूछो कि कहाँ गया वो पाप ,
और कृपया उत्तर पाकर  सूचित करना आप।

तो अब लक्ष्य था , बादल का घर , पहुंचा फिर उससे पूछा ,
तुम श्रेष्ठ  दानी बादल हो , धरती को तुमने सींचा ;
किन्तु चाहूं  एक प्रश्न पूछना , उत्तर देना आप ,
जो सूरज ने तुम्हें दिया था , कहाँ गया वो पाप;

हो गम्भीर , बादल बोला , "हे अनुपम , लाओ कान ",
धन्य हो तुम कि पूछा तुमने ,ये प्रश्न है अति महान।
जो पाप सूर्य से मिलता है , उसे पानी में मिलवाता हूँ ,
उस जल मिश्रित पाप को मैं धरती वापिस भिजवाता हूँ।
जिसका जितना होता है, उसको वापिस कर देता हूँ ,
और नए पाप का ढेर सूर्यदेव से लेता हूँ।

मानव गंगा में देता है , सिंधु गंगे से पाता है,
फिर सूर्य उस पाप को ले चक्र आगे बढ़ाता है। 
मैं सूरज से लेकर उसको वर्षा जल में मिलवाता हूँ। 
जिसका जितना होता है उसको वापिस करता जाता हूँ।  

उत्तर पाकर मैं लौट चला, जो पाना था वो पाया ,
सूचित करके देवजनों को मानव को भी  बतलाया ;
किन्तु मानव है "श्रेष्ठ", अतः उसने कहा न माना ;
इस आपबीती घटना को उसने कविता मात्र ही माना।

अब भी लोग जीते हैं , पाप करते हैं , और हरिद्वार जाते हैं ,
और ये सोच गंगा में नहाते हैं ,
कि गंगा में नहाने से सारे पाप धुल जाते हैं 




अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com

असर ...!!! (30 - July - 2006)

गीत भी लिखा तो ग़ज़ल  बन गयी.… 
ये तेरी "याद" का असर था। 
हंसना चाहा तो आंसू  बरस पड़े.… 
ये तेरी "आह" का असर था। 
छुआ जो किसी और को उँगलियाँ तड़प उठी.…
ये तेरी "चाह" का असर था। 
चले थे इबादत को पहुंचे तेरे मकान को.…
ये तेरी "राह" का असर था। 
"दिल" धड़कना चाहता था , पर "दिल"नहीं .… 
ये तेरे "असर" का "असर" था। 

अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com

कॉल लैटर ...!!! (13-August-2003)

कागजों के ढेर के ऊपर पड़ा एक कॉल लैटर भी था ;
युवक के सामने , उसकी आँखों के  लक्ष्य पर ;
मेडिकल कॉलेज के लैटर हेड पे ,
उसके प्रवेश को प्रतीक्षरत ;
विद्यालय स्तर तक सर्वश्रेस्ठ था , किन्तु शायद अब नहीं ;
क्योंकि अब जरुरत "अर्थ" कि थी ,
१२ लाख में प्रवेश बिक रहे थे ,उससे मांग १० लाख कि थी।
उसने एक पल सोचा …
कितने मिलेंगे इस मकान के??
शायद ४ लाख में बिकेगा ....  और बाकी ६ लाख ??
और नज़दीक ही बहन  कि शादी है।
इसी उधेरबुन में एक विचार फिर कौंधा ,
क्यों न लोन ले ले.…
कम ब्याज पे शिक्षा लोन।
१ माह भागदौड़ के बाद, १० लाख का चेक हाथ में लेकर
चेहरे पर ख़ुशी के साथ , वापिस घर पहुंचा।
आश्चर्य  लड़के वाले प्रत्यक्ष थे।
लोन कि खबर उन्होंने भी सुनी थी।
और अब विवाह से १० दिन पूर्व
दहेज़ के लिए ८ लाख मांगे थे।
उनको विदा कर फिर उधेड़बुन में डूब गया वो।
अब क्या करे… दाखिला ले या दहेज़ दे दे।
बहन को देगा तो लोन कैसे वापिस करेगा ??
इसे चिंता में उसे नींद ने आ घेरा।
अगली सुबह तैयार होकर वो कहीं जा रहा था।
दबे पांव भारी मन से.… न जाने कहाँ को अग्रसारित था।
अरे !!! ये तो लड़के वालों कि गली है।
और कॉल लैटर ?????
अरे वो तो डस्टबीन में पड़ा है।



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com

सवाल - 2...!!!!!(2- Dec-2013)




सवाल .....!!!! (23 - May-2013)


तुम न... तुम ना कसम से मेरी जान ले लोगे !!(9th-August-2013)


ओफ्फो .....!!! (July 2013)


आह....(19-11-2013)


दीपक बनाम अँधेरा ...!!! (16-01-2004)




रात  की तरह अँधियारा फैला है.. 
मन  में और बाहर ;
और आज चाँद भी नहीं निकला;
रात डरावनी है.... मैं डरपोक नहीं 
डरूंगा तो जियूँगा कैसे ?
मुझे तो दीपक जलाना  है.. 
अंधियारे के बीच... उजाले के लिए ;
लेकिन , लेकिन मुझे दीपक कौन दिखायेगा??
क्या कोई दूसरा "अनुपम "??
और उसे ??
ओह , प्रश्न गम्भीर है ,  उत्तर जटिल;
आहा !! उत्तर पा  लिया, इतनी शीघ्र ;
मन उत्तर जानता था दिमाग नहीं;
मैं स्वयं का मार्गदर्शन करूँगा ;
स्वयं दीपक बनूँगा ;
अब , मैं प्रतिनिधि बन पाउँगा , उजियारे का ;
अन्धकार मिटेगा निश्चित ;
ओह, लेकिन मेरी कौन सुनेगा??
मेरी  बतायी राह पर कौन चलेगा ??
आज सब समझदार हैं,
सब जानते हैं , दो कानों का सर्वोत्तम प्रयोग ;
वो अँधेरे में भी जी सकते हैं ,
उन्हें  उजाले कि क्या आवश्यकता ?
वाह!! अब उजाला सिर्फ मेरा है 
किसी को नहीं दिखाऊंगा ;
लेकिन , लेकिन  उजाला छुपता नहीं ;
क्या करूँ?? क्या करूँ ??
आहा !! दिमाग से उत्तर पाया ;
तुम्हे बताऊँ , " मैं दीपक बुझा दूंगा " 
हा हा हा हा हा 
न रहेगा बाँस , न बजेगी बाँसुरी ;
किसी को उजाला नहीं चाहिए ;
क्या तुम्हे चाहिए ????



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8447757188


Wednesday, 11 December 2013

कंक्रीट.....!! (2009)

कंक्रीट ,बस यही शब्द काफ़ी है,
मेरी ज़िन्दगी की इमारत, कुछ ईंट ,गारे ,रेट पर खड़ी है,
ओर मै ख़ुद पलस्तर पर पानी डाल डाल कर थक चुका हूँ;
मेरी उम्मीद इस छत का ढूला सा है,
मेरी इन्सानिअत फर्श पर लकीर सी चिपकी है ,
पर मै, अभी भी जिंदा हूँ....साँस लेता हूँ,
क्योंकि ये कंक्रीट .....मुझे जिंदा चाहती है,




राजमिस्त्री मुझे ११ फीट बनाना चाहता था,
और मैं ...मैं बुलंदी चाहता था।
मजदूर मुझे तीन हाथ खोदना चाहता था ॥
और मैं...मैं पाताल तक खुदना चाहता था।
समय ने मुझे सीमेंट की सिल्ली सा पकड़ लिया था ,
ऊँची सीदी ने आधी दूरी पर मुझे पकड़ लिया था,
मैं बजरी सा खुदरा था , हूँ ,रहूँगा।
और ये कंक्रीट मुझे सपाट रखना चाहती है।


ये इमारत बस गिरने वाली है ,
हर दीवार बदसूरत है, खोखली है,खाली है।
हलकी- हलकी सी थकान ,सीलन सी लगती है,
मेरी आँखों से एक भभकन सी निकलती है,
मेरी बगल वाली ईमारत छोटी थी ,ऊँची कैसे हो गई,
मेरे मकान पर लगी नेमप्लेट किस धुएँ में खो गई ;
ये सीदियाँ, क्या बस भटकाना जानती हैं,
और कंक्रीट .....
कंक्रीट ,तो ख़ुद कंक्रीट में घुलकर कंक्रीट बन 


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8447757188

स्वप्न .......!!! ( 31 Dec 2008)

स्वप्न क्या एक शब्द है, मात्र एक शब्द;
सार्थकता से परे, मात्र एक शब्द;
शब्द जो आकार में नहीं ढल सकता;
शब्द जो ध्वनि में नहीं बंध सकता,
शब्द जो वायु सा तीव्र तो नहीं,
शब्द जो अग्नि या नीर तो नही,
फिर क्या सार्थकता उस शब्द की,
जो मानवीय चिंतन से परे हो !!

स्वपन जो एक शब्द नही , एक एहसास नही,
एक पराकाष्ठा है , मानवीय उद्वेलना की,
एक असमझा सा दृश्य ही तो है,
एक गूढ़ सा पीला प्रकाश ही तो है,
जो शायद अपूर्ण सा या अनंत सा लगता है ,
वो अनंत जिसका कोई आदि नही ,
फिर क्या सार्थकता उस शब्द की,
जो मानवीय मूल्यों से परे हो !!

स्वप्न , सिर्फ़ मेरा तो नही,और आपका?
जो दृश्यमान होकर भी अदृश्य है,
कभी लगता है हाथ बढाऊँ और छु लूँ,
या फिर एक शीतल पेय , उठाऊँ और पी लूँ,
शायद मेरी उम्मीद की नींव है मेरा स्वप्न ,
शायद , मेरी साँसों का संगीत है मेरा स्वप्न ,
फिर क्या सार्थकता उस शब्द की ,
जो मानवीय सार्थकता से परे है।

स्वप्न .....एक कोरा स्वप्न ......!!


अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8447757188

जिंदगी (20 /Oct/ 2009)

कल मैंने ज़िन्दगी को हँसते हुए देखा,
शायद हँसी ज्यादा खूबसूरत थी, या ख़ुद ज़िन्दगी;
दो पल उसे देखा , और फिर मैंने नज़रें झुका लीं ,
डर था कहीं उसे मेरी ही नज़र ही न लग जाए;
जिंदगी और मेरे बीच एक शीशे की दीवार;
और उस दीवार पर लगी, उज़ली नीली रौशनी;
पर उस उज़ली रौशनी से ज्यादा उजाली ख़ुद ज़िन्दगी;


जिंदगी के मुंह से निकले दो शब्द " क्या हुआ";
जिसका जवाब न मैं दे सकता था, न देना  ही था;
कई बार सवाल , जवाब से ज्यादा खूबसूरत हो जातें हैं,
कई बार सवाल , सवाल न रहकर "जिंदगी" बन जाते हैं;
जिंदगी की आँखें जैसे , दूध से भरी झील,
और उस झील के बीचों बीच बैठा एक कला हंस ,
पर उस झील की गहराई से ज्यादा गहरी ख़ुद जिंदगी;


पर आज जिंदगी के माथे पर एक सिलवट दिखाई दी,
वो सिलवट जो मेरी जिंदगी लेने के लिए काफ़ी थी,
काश मैं ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका बन पाता,
हर सिलवट, हर गम, उड़ा के ले जाता,
पर अभी मेरे शब्द रुक रुक से जाते हैं,डरते हैं;
माना वो इंसान हो सारी कायनात के लिए,
पर सारी कायनात हो एक इंसान के लिए,
मैं अवाक , निशब्द,पर मुझसे ज्यादा निशब्द ख़ुद जिंदगी ।



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com

दौर !! (29-Apr-2010)

बस ऐसे ही....!!!!

कुछ शब्द हैँ  जो लिखे थे किन्ही परिस्थितियों में , बस ऐसे ही , कहीं लिख डाले थे बस ऐसे ही किसी डायरी में। अब उस डायरी के वो पन्ने फटने लगें हैं , तो सोचा क्यों न लिख डालूं उन्ही पंक्तियों को बस ऐसे ही फिर से कही , ताकि  वो शब्द मर न जाएँ ....




१) मेरी धड़कन दिल में रहने का किराया माँगने लगी..
भटकती रूहें क़ब्रों में रहने को सहारा माँगने लगी..
अजीब दौर है , आज गंगा में पानी नही खून बहता है ..
मछलियाँ उछली , मछुआरों से किनारा माँगने लगी !!


२) वो मुझी से मुझी को छीनना चाहता है..
अजीब है पहले फैंकता है फिर बीनना चाहता है..
सब जानते हैं मैं हज़ार बार हारा हूँ..
नामुराद सिकंदर नस्ली है , फिर से जीतना  चाहता है!!


३) तू दौलत छीन सकता है , मेरा ख्याल नही..
मेरा जवाब बदल सकता है , मेरा सवाल नही..
अरे मैने जो लुटाया , वो कमाकर लुटाया है..
जो लूट सारा सूद था मेरा हलाल नही !!


४) बदन के हर हिस्से में कपकपी दौड़ती है..
ये नायाब रूह है , कभी पकड़ती कभी छोड़ती है..
मेरे बालों की मत सोच मेरा सर उड़ा के ले जा..
ये सर्दियों की धूप है , कभी पुचकारती है कभी खौलती है!!!


५) मैं रो  रहा था , मुझे थपकियों से चुपाया गया..
मैं मोम न था ,  फिर भी धूप से बचाया गया..
एक वो आदमी था , जो भूख से मर गया..
मुझे प्यास क्या लगी , सुर्ख खून  पिलाया गया!!


६) उस रात सपना  तो आया पर नींद नहीं आयी..
मैं बैठा रहा उसे नहीं आना था वो नहीं आयी..
हौले हौले मेरी साँसे रुकीं नब्ज़ थमी खून टपका ..
लाल लिबास में जनाज़े पे आयी , उसे शर्म नहीं आयी!!


७) मेरे ख्वाब ही काफी हैं , मुझे  कोई और सच  नहीं सुनना ..
दिले - मदिर में  रखा है तुझे , कोई और ख्वाब नहीं बुनना ..
यूँ तूने तो न बताया  मगर तेरी आँखें तो बोलती हैं..
तेरी साँसे सुन चूका हूँ , अब राग दरबारी नहीं सुनना !!


८) मैं जानता था  के मैं शीशा हूँ , टूटूंगा, फिर भी पत्थर को ललकारा ..
मैं जानता था के ये सांप है, काटेगा, फिर भी पाला पुचकारा ..
मैं जानता था के ये मोहब्बत है,मेरे बस कि बात नहीं..
समझाया दिल को पर वो नहीं माना , फिर से टूटा बेचारा !!


९) मैं सांपो की बस्ती में दूध बेचता हूँ..
मैं फूलों के बगीचों में काँटे सींचता हूँ..
आईने में शक्ल देखी है मैंने ख़ुद की..
वो मुझ पे मरती है ये ख़ुशफहमियां सहेजता हूँ!!


१०) मेरी  लाश पड़ी थी दीमक आये गुदगुदाने लगे ..
हाथ-पाँव धड़ को छुआ भी , दिलो-दिमाग़ ख़ाने लगे ..
पर उसके असर से उनपे क़यामत सी गुजरी ..
घर पहुँचे बीवीओं को छुआ भी नहीं , कवितायें सुनाने लगे!!


११) वो मेरी चाहत को अपना जो लेती ठीक था ..
वो अगर अब दूर है तो न मिली तो न सही..
मेरी कलम के साथ थी और साथ ही रहना उसे ..
जो कसीदा लिख नहीं पाया मियाँ सजदा सही !!


१२) वो मेरे कदमो पे आके गिर गयी और रो पड़ी..
 मन किया कि चूम लूँ  पर क्या करूँ वाजिब न था..
जो मैं उसको छू भी लेता चूमना तो दूर था..
लो कहते मर गया , पर अब भी आशिक़ कम नहीं !!



१३) तू कहे तो आसमां से चाँद तोड़ लाऊँ..
तू कहे तो फरिश्तों कि फ़ौज़ ले आऊँ..
बस तेरे कहने का इंतज़ार है ..
क्योंकि मुझे तेरी दौलत से बहुत प्यार है !!


१४) चूस कर मेरा लहू , फेफड़ा यूँ खा लिया..
मानो खूं लिम्का कि बोतल और बर्गर फेफड़ा !!


१५) मंज़िलो को ढूँढने में हम तुम्हारे साथ हैं ..
लेकिन कमी  एक चस्मे कि है वो दिला दो तो चलें !!


१६) आन्सू बहाने का सबब क्यों मैं  सरेआम करूँ ..
मुझे जिंदगी ने मारा है , मैं मौत को क्यों बदनाम करूँ ..
तेरा दिल है तो रह, वरना जा , मुझसे मत पूछ ..
तेरे रुकने भर के लिए मैं क्यों दीवाना नाम करूँ !!!


१७) वो भी दिन थे जब राजा थे , अब भीख मांगते हैं ..
कभी चाँदी के चम्मच से खाते थे , अब ख़ाक छानते हैं ..
हमसे दोस्ती करते तो मज़े में रहते ..
दुश्मनी की , पहले पतलून पहनते थे , अब पायज़ामा टाँगते हैं!!


१८ ) सुनहरे बाल, सुनहरी आँखें , उसके ख्याल सुनहरे ..
सुनहरे पांव , सुनहरे होंठ , उसके सवाल सुनहरे ..
सुनहरी सुनहरी से लगती थी जब आती थी सपनो में..
सुनहरी चप्पल , सुनहरे थप्पड़ , हमारे गाल सुनहरे !!!


अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com



Tuesday, 3 December 2013

अविषा (28 Sep 2009)

एक ख्वाब जो अधूरा - अधूरा सा,
ख्वाब जो जागती आँखों के पास से होकर गुजरा;
एक ख्वाब जो इतना अधूरा था,
जितनी मेरी जीने की चाह अधूरी ,
अविषा ने मेरे कानो के पास कुछ बुदबुदाया ;
और वो ख्वाब और अधूरा हो गया;
उतना ही अधूरा , जितनी अविषा की वो बात अधूरी।

उसने कुछ कहना चाहा, पर उसे उस वक्त ने रोक लिया,
कभी बात अधूरी , कभी हालत अधूरे,
एक शंख सा कानो में गूंजा , और वो गूँज और गहरे में उतर गई ,
अविषा ने उस गूँज को मखमली बना दिया,
और वो अधूरी गूँज , और अधूरी हो गई;

उस सिहरन का कोई नाम न था,
शायद नाम होता तो वो और अधूरी हो जाती ,
अविषा बोली , और बोली , बस बोलती चली गई ;
उसने नही रुकना था , सो नही रुकी,
मैंने चाहा उसे रोकूँ , पर क्योंकर रोकूँ ,
कभी अल्फाज़ अधूरे , कभी हर शब्द अधूरा।

एक खुश्बू , जी गीली मिटटी सी मीठी , सागर सी गहरी,
एक तितली , इन्द्रधनुष सी प्यारी , रौशनी सी सुनहरी ,
अविषा रुकी पर फिर से बोलने के लिए ,
उसके शब्दों के साथ पानी के दो छींठे ;
छींठे जो मेरे दायें हाथ की कलाई पर पड़े ,
मैंने अविषा को देखा , उसने मुझे ;
और बिना कुछ बोले , दोनों मुस्कुरा दिए;
शब्द अधूरे ....अर्थ अधूरे...ख्वाब अधूरे... ।



Anupam S Shlok
28-Sep-2009
08447757188
www.anupamism.blogspot.com

अपराजिता (20-Feb-2010)

एक शब्द जिसका कोई अर्थ नहीं ,
पर वो इतना अर्थहीन भी नहीं;
वो स्वयं में एक अर्थ,
पर शब्द, शब्दकोष में नहीं;
तुम वो शब्द ,और स्वयं ही उसका अर्थ,
तुम प्रेरणा उस अर्थ की "अपराजिता"।



एक अलौकिकता मगर अपूर्ण,
अपूर्णता जो पूर्ण से अधिक पूर्ण;
प्रायः विचारों को बेधती , कचोटती,
पर बेधन व्यक्तित्व का संभव नहीं;
तुम अलौकिक , अनुपम, मैं अकिंचन;
तुम मूल उस अलौकिकता की "अपराजिता"।



एक बहाव नदी का नहीं संवेदनाओं का ,
पर संवेदना ,दबी सी , भयभीत सी;
कभी भाव हावी, कभी विचार,
बहाव कभी भावों पर हावी, कभी विचारों पर;
कभी नौका बदल जाती है ,कभी नाविक,
तुम आकर्षण उस बहाव का "अपराजिता"।




एक योजना जो दिव्य, दैवीय ,
मनुष्य, किंकर्तव्यविमूढ़, असहाय ;
स्नेह, बंधन को टटोलता,
बंधन, जो शब्द उचित नहीं;
पर उचित या अनुचित सब योजना से परे,
तुम अभिनेत्री उस योजना की "अपराजिता" ।


Anupam S "Shlok"
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कर्म- सार (11- May -2003)


रात के अंधेरे से उज़ाले की ओर...
मयूरी का नृत्य, मृदंगो का शोर...
चलायमान थे पद मेरे ...
कभी तीव्र कभी हो जाते थे धीरे..
बस शून्य को पाना चाहते थे..
ईश्वरीय प्रेम-सुधा को गाना चाहते थे..
माया के अंतः द्वंद को त्यागकर..
दुष्प्रवृत्तियों रूपी देह को मारकर..
मंद-मंद जलद की बूंदे..
थी जलमग्न राह की कूंजे..
सांध्यगीत की बेला उत्तम..
अंतःमन की राह पर हरदम..
नश्वर जगत को त्यागकर फिर से..
ईश्वर प्राप्ति जानी थी घर से..
प्रार्थना को त्यागकर अधिकार हेतु..
आज पार करना था दीर्घ सेतु..
मैं था द्रढ़-निश्चय से निकला ..
जाना स्वयं को अब तक पगला..
सहसा सामने मंदिर आया..
मूर्ति रूप में कृष्ण को पाया ..
उनके जीवन पर विचार से एक अंश को प्राप्त किया..
मानव रूपी देह से ही जीवन को समाप्त किया..
ना वैराग्य ना था कुछ छोड़ा..
अर्थ ,घर ,हाथी और घोड़ा ..
क्या वो समझना चाहते थे ??
कर्म- सार लाना चाहते थे..
धर्म अर्थ को तुम जानो ..
सत्या , दया , दान को मानो..
वैराग्य धारण नही है धर्म..
सर्वोपरि मनुष्य का कर्म ...
ईश्वर को पाना चाहते  हो ...
पूर्ण करो कर्तव्य तुम अपने..
यह निश्चित है, कर्मकांड से ..
पूर्ण होंगे सुंदर सपने ...
वापिस लौट चला था घर को ..
मार सका था पूर्व तेवर को 
तब से ही ये बतलता हूँ ...
कर्म सार को मैं गाता हूँ ..
"निश्चित ही है , ईश्वर प्राप्ति ...
जब होगी जीवन समाप्ति...


अनुपम S. "श्लोक "
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