Friday, 6 March 2009

आभास

एक प्रयास , एक तरंग , एक आभास ,अभिवादन.......



तेरी यादों के तकिये पर मैं सर रखकर के सोता हूँ,
मैं हँसना चाहता हूँ हर घड़ी , हर वक्त रोता हूँ ,
कफ़न मेरा हमेशा पास ही थैले में रहता है,
मेरी मय्यत पे तू आएगी ये सपने संजोता हूँ।

तेरा रोना मेरी रानी मुझे गमगीन कर देगा,
तेरा यूँ इस कदर हँसना कसम से जान ले लेगा,
तू रोदे या सनम हंसदे हमारी जान जाना तय ,
ओर जो कुछ नहीं करती तो दिल से कौन खेलेगा।

जब मेरे साथ होती हो, तब मैं कुछ कह नहीं पता,
तब न मैं जिन्दा होता हूँ ,और सनम मर नहीं पता,
मेरी हर साँस कहती है , तू मेरी है , तू मेरी है,
ये बदन चीखता है , पर लबों से कह नहीं पता।

मेरी हर बात को तुम क्यों सनम दिल पे लगाती हो,
मैं प्यासा हूँ तुम्हारे प्यार का तुम क्यों सताती हो,
मेरे हर ख्वाब में आती हो ,जैसे रात की रानी ,
कभी तो दूर रहती हो ,कभी आंसू बहाती हो।

मैं सूरज की तरह जलता हूँ उसकी याद में यारो,
कभी मैं दौड़ पड़ता हूँ, कभी चलता नहीं यारो,
मैं जब भी साँस लेता हूँ तो मुझको दम नहीं आता,
मैं हूँ जिन्दा या मुर्दा हूँ , अब मुझे क्या पता यारो।

तेरा वो रात को पन्ने पलटना याद आता है,
तेरी आँखों का काजल , गाल का तिल याद आता है,
मेरी बाँहों में तेरा खिलखिलाना किस कदर भूलूं,
जनाजे पर मेरे , तेरा न आना याद आता है।

मेरी साँसे थमी हैं, दिल रुका है, जान बाकी है;
मैं हूँ साईल, न है साहिल , अभी तक शान बाकी है,
तेरी बातों में आकार , अब कभी मैं प्यार न सोचूं,
हड्डिया गल चुकी हैं,खून गायब, खाल बाकी है।

ऐ, दुनिया तुने मुझको जो सिखाया , वो भला चंगा,
गम के सागर मिले हैं, पर नहीं है प्यार की गंगा,
तू मेरी सोच में है, शब्द में है, गूँज में बाकी ,
जो मेरी जिंदगी था, बन चुका है, खेल और धंधा।


अनुपम S. "Shlok"
8447757188
anupamism@gmail.com

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