Tuesday, 20 October 2009

दोनों छोरो पर

दोनों छोरो पर(19 Oct 2009)







एक नदी के दोनों छोरो पर खड़ा मैं,
कभी इस पार से देखता हूँ, कभी उस पार से,
ये द्वंद व्यक्तित्व को जानने का है,
ये द्वंद स्वयं को पहचानने का है;
कभी परिस्थितियां विकट हो जाती हैं , कभी मेरे विचार;
कभी स्वयं को छेदना पड़ता है, कभी उलाहना ;

फिर भी दोनों छोरो पर खड़ा मैं, एक बात तो जानता हूँ,

मैं दोनों छोरो पर खड़ा हूँ , यही मेरी जीत है ,
मैंने तथ्य पर प्रश्न किया है , यही मेरी जीत है,
पर कभी जीतना महत्वपूर्ण नही लगता , कभी दोनों छोर;
मैं ये जानता हूँ , बहाव तेज़ है, पर पार करना है,
कल शायद मैं न रहूँ , बहाव न रहे , या न रहें दोनों छोर,
पर जो रहेगा , वो अलोकिक होगा , वो अनुपम होगा,
शायद मैं वो पा सकूँगा , जो मैं पाना चाहता हूँ,

पर अभी तो मैं ये भी नही जानता , कि मुझे पाना क्या है.....?




Regards
Anupam S.
(SRC 2009)
8447757188
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