Tuesday, 7 December 2010

सफ़ेद बत्तख





असलम की अम्मी आँगन में बैठी सिल में चटनी पीस रही थीं, की इतने में असलम दौड़ा दौड़ा स्कूल से आया और बस्ता पलंग पे फैंक कर अम्मी के कन्धों पर चढ़ गया। असलम का परिवार रावलपिंडी से ७० कीमी दूर वरदा नाम के छोटे से गाँव में रहता था। गाँव में कुल ७० परिवार थे , ५५ मुसलमानों के रहे होंगे ओर बाकी हिन्दुओं के। ये सन १९४७ से पहले की बात है। असलम अभी फिछले महीने ही १४ साल का हुआ था , नाम की दोस्ती यारी थी।चार भाईओं और तीन बहनों में पांचवां असलम था। आज स्कूल में शाहिद से लड़ाई हो गयी थी, और असलम ने शाहिद की कलम तोड़ थी इसीलिए असलम शाहिद से बचने के लिए स्कूल ख़तम होते ही जल्दी से भाग के घर आ गया था।








अम्मी के कंधो पे चदते ही अम्मी को समझ आ गया था की उसे भूख लगी है । असलम के कुछ कहने से पहले ही अम्मी ने कहा " रुक जा असलम कुछ देर , पहले चटनी पीस लूँ फिर तुझे खाना देती हूँ" । असलम जाकर अन्दर पलंग पे लेट गया। कुछ देर बाद काम से निपट कर अम्मी ने उसे खाना दे दिया , आज अम्मी ने उसका पसंदीदा बैंगन का भरता बनाया था।






असलम ने जल्दी जल्दी खाना खाया ,ओर रोज़ की तरह पतंग ओर चरखी लेके छत पर चढ़ गया। उसने सोचा था की आज वो रफ़ीक ओर मुन्ना की पतंग जरुर काटेगा। उसने पतंग के दोनों सिरों पे छेद किया ओर कन्ने बाँधने लगा । तभी उसकी नज़र बगल वाले घर की खुली खिड़की पे गयी । ये घनश्याम दूधवाले का घर था , जिसे असलम चाचा कहके बुलाता था।






खुली खिड़की में असलम ने कुछ ऐसा देखा , जो उसने कभी नहीं देखा था। ये घनश्याम चाचा के स्नानघर की खिड़की थी ,ओर जब उसने अनजाने में खिड़की से अन्दर की तरफ देखा तो अन्दर घनश्याम चाचा की १६ साल की लड़की पुन्नो नहा थी। उसके बदन पे कपड़ो के नाम पर दूध सी सफ़ेद चमड़ी के सिवा कुछ भी नहीं था।






असलम दुबका ओर पतंग उड़ना भूलकर उस नज़ारे को देखने लगा। असलम को समझ नहीं आ रहा था की ये कैसी सिहरन है । जिसने उसके रोंगटों को खड़ा कर दिया है।वो तो बस पुन्नो को देखता रहा ,हालांकि वो ये भी नहीं जानता था की वो देखना क्या चाहता है।






वो कभी पुन्नो की नुकीली नाक को देखता तो कभी गदरायी जांघो को,कभी पीठ तक के बालो को देखता तो कभी छाती के उभारों को , तो कभी वो बदन पे तैरती पानी की लकीरों का पीछा किया करता .वो तो बस वहां बैठा रहा ओर उस सब को देखता रहा जो उसने कभी नहीं देखा था। वो तब तक वहां रहा जब तक पुन्नो अपनी हरी कमीज़ और सलवार पहनकर वहां से चली नहीं गयी। उसके बाद असलम का मन पतंग उड़ाने का भी नहीं हुआ।






वो नीचे आकार तख़्त पर लेट गया ओर काफी देर तक आँखें बंद करके दुबारा वही सब देखने की कोशिश करता रहा जो उसने कुछ लम्हे पहले देखा था।


उस दिन के बाद तो असलम ये रोज़ करने लगा,वो कोशिश करता की ज्यादा से ज्यादा समय वो छत पर रहे ताकि वो खुली खिड़की के अन्दर झाँक सके। किसी किसी दिन वो घंटो वहां खड़ा रहता ओर मायूस ही रह जाता,कभी कभी खिड़की बंद मिलती ,कभी कभी पुन्नो की जगह घनश्याम चाचा को देखना पड़ता।






दिन महीने बीतते रहे ,एक दिन लोगों को बटवारे का पता लगा। उस दिन असलम की अम्मी ने उसे घर पर ही रहने को कहा था, वो घर में अकेला था । वो छत पर गया पर आज खिड़की बंद थी।वो वापस नीचे आया और आकर पलंग पर लेट गया । उसके दिमाग में अभी भी वो पल जिन्दा थे जो वो पिछले कुछ समय से जी रहा था।


इसी उधेड़बुन में उसके कानो में अज़ीज़ की आवाज़ पड़ी । असलम बाहर निकल कर गया तो अज़ीज़ ने उसे बताया की रफ़ीक और उसके दोस्तों ने एक "सफ़ेद बत्तख " पकड़ी है ,अगर तुम देखना चाहते हो तो चलो। उसने सोचा की घर में रहने की बजाय सफ़ेद बत्तख देखने जाना ज्यादा अच्छा है । उसने दरवाज़े पे कुण्डी लगायी और वो अज़ीज़ के साथ चला गया।


वो रफ़ीक के घर पहुंचा तो उसने देखा की घर पर रफ़ीक और उसके तीन दोस्तों के सिवाय कोई नहीं था। अज़ीज़ ने रफ़ीक से कहा की मैं असलम को सफेद बत्तख दिखाने लाया हूँ और हम उसके साथ खेलना चाहते है। असलम बहुत उत्सुक था क्योंकि उसने ज़िन्दगी में कभी भी बत्तख नहीं देखी थी।


रफ़ीक बोला , " ठीक है ,बत्तख अन्दर कमरे में है,साली हिन्दू बत्तख है ,उड़ के दूसरी तरफ जा रही थी पर हमने पकड़ लिया. और ये कहके रफ़ीक ने दरवाजा खोला ,असलम ने अन्दर आके देखा तो अन्दर एक लड़की पलंग पे पड़ी हुई थी ,उसके शरीर पर एक भी कपडा नहीं था। असलम ने जैसे ही चेहरे की तरफ देखा वो दहल गया। ये पुन्नो थी। असलम ने पुन्नो के जिस्म को ध्यान से देखा ,जब भी पुन्नो सांस लेती उसकी छाती ऊपर नीचे होती थी ,इसके सिवाय उसके जिस्म में कोई हरकत नहीं होती थी।


इतने में रफ़ीक बोला "आओ मैं तुम्हे बत्तख से खेलना सिखाता हूँ"। ओर ये कहके रफ़ीक पुन्नो से "खेलने" लगा। पुन्नो के जिस्म अभी भी कोई हरकत नहीं थी,वो तो बस "जिन्दा मुर्दा" थी ।


एकदम असलम को ये सब डरावना लगने लगा ,वो दरवाज़े को जोर से धक्का दे वहां से भाग खड़ा हुआ। वो घर आया और जाकर छत पर खड़ा हो गया। उसने खिड़की की तरफ देखा ,खिड़की बंद थी।उसका दिमाग उसे फिर से वोही सब दिखाने लगा जो उसने थोड़ी देर पहले देखा था।


इतने में छन् की आवाज़ हुई । खिड़की पर किसी ने पत्थर मारा था। तभी दूर से आती हुई एक आवाज़ असलम को सुनाई दी॥


" अरे जल्दी आओ , घनश्याम की बीवी अभी अन्दर ही है...




Regards
Anupam S.
9619499813
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