Sunday, 8 April 2012

एक मटमैले पंछी और चितकबरे कौवे की कहानी!!! (7th April 2012)


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एक मटमैला पंछी मिला एक चितकबरे कौवे से;
लगा उसे कुछ, मिला उसे कुछ , नया नया कुछ;
दिनभर खाना ढूँढना, बिना लक्ष्य उड़ना,
आह...कितना पुराना सा;
अब पल भी ठहरने लगा था , और ठहराव व्यक्तित्व में भी था;


एक भाव था सुनहरा- सुनहरा, जंगल हर भरा लगने लगा,
ना तो कीट पतंगो को ढूँढना होता, ना ही डर किसी का;
बस ओतप्रोत हर चीज़, भाव एक , मात्र "शुद्ध"!!


पर कौवा कुछ और चाहता था, जो पंछी से छुपा था,
दिन बीतते रहे, विश्वास बदता रहा,
एक दिन कौवा ले चला उसे दूर, उसके जंगल से दूर;
पंछी अकेला था, पर विश्वास दृढ़ , अकेला नहीं.


कुछ भावनाएँ, समय, डर, अविश्वास,संताप से नही दबती,
छेद देती हैं हर संदेहरूपी हाइड्रॉजनमयी गुब्बारा,
सच कभी सिर्फ़ एक व्यक्ति तक सीमित हो जाता है ,
सीमित हो जाता है हर एक दायरा, हर भाव, मात्र "शुद्ध"!!


पर कब तक रहते चितकबरे, पंछी के साथ;
वही हुआ जो निश्चित था,
अभी पंछी घायल था मरा नही , बस मरने का इंतज़ार था,
चितकबरो की चोन्चे वार करती रही,करती रही, करती रही....


आख़िरी शब्द निककलना नही चाहते थे,
पंछी कुछ और झूठे पल जीना चाहता था,
कुछ और पल , केवल "उसके" लिए...
जिसकी चोंचो ने लहलुहान कर दिया था,

आख़िरी शब्द थे.....

"जो मेरे साथ हुआ किसी से ना कहना"!!


Regards
By :- अनुपम S. "श्लोक"
7/Apr/2012
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