Sunday, 8 April 2012

मैं


भाग १)


कुछ सवालों के अधूरे सफ़र की मंज़िलो को ढूंढता मैं,
कुछ सुनहरे शब्दो के अनसुलझे मतलबों को ढूंढता मैं,
कही गिरता,कहीं बिखरता,टूटता,सिमटता,शीशे के गिलासों सा मैं,
ठंडा सा वेगवान, अविरल, नित्य, दरियाओं की नियती सा मैं!

भटकता हुआ,थकता हुआ, उठता, चलता हुआ,
अबोध किंतु लालायित, ज्ञान पृष्ठ पलटता मैं,
रिश्तो,नज़दीकियों,नातो,समृद्धि,प्रेम,भय से भागता मैं,
मानवीय,दैविय, हलचलों के बीच,स्वीकृत को अस्वीकृत सिद्ध करता मैं!!


भाग २)



क्या मैं हार चुका हूँ जो हार स्वीकार नही करता?
या मैं जीता हूँ जो हार के भय से आगे खेलना नही चाहता?
मैं तलाश स्वयं की कर रहा हूँ या स्वयं से दूर भागता?
क्यो निमित्तता भयभीत करती है मुझे, क्यो आग्रह कचोटता है मुझे?
मेरे प्रश्न गंभीर अधिक हैं या गूढता की चाह में असंगत?
मेरी दृश्यता की चाह कहीं आह्वान तो नही करती अदृश्यता का?
विनम्रता दिखावा है या दृढ़ता भुलावा?
जन्म बाधक, मृत्यु भय, मोक्ष असिद्ध अभेद!

मेरा प्रश्न वही नित्य....

"जिस राह पर मैं हूँ, कही उसकी मंज़िल को पीछे , बहुत पीछे छोड़ तो नही आया हूँ मैं?"



Regards
अनुपम S. "श्लोक"
2/Apr/2012
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