Monday, August 24, 2015

Respect HR ..(21-08-2015)

My Contribution to the Function which has given me Bread & Butter.


Thursday, April 9, 2015

The Death Preference...!!!

I asked some kind-hearted individuals that if given a choice how and when they would like to die..? This Video is compilation of their beautiful & genuine answers.
I thank Mr. Jitendra Tomar , Mr. Guha , Ramesh ,Mr. Rallabhandi Sreenivas , Anand & Prince Trivedi for giving me this opportunity to talk to them & shoot them .

Video Language - Hindi & English
Video Length - 3 Minutes 18 Seconds
Concept , Compilation & Camera - Anupam S Shlok

Tuesday, March 31, 2015

Isn't it hard to be a woman in this world ..?(31-Mar-2015)

I am unfortunate to create a video like this..Which is nothing but pain..This is responsibility of each & everyone of us to make this world a better place to live , specially for WOMEN of our lives..
Why being woman has been a curse..?? Why there is no gender equality..?? Why crime against woman is going up by Modernization of societies ?? Why there is no end of it....???
This is my pain , my respect for women...!!
(Some Portion of the Video may disturb you , but still don't miss to watch it )


#anupamism
Anupam S "Shlok"


Tuesday, October 7, 2014

प्रनाली एक रँडी - जिसकी कहानी दर्दनाक नही थी....!!(7- Oct-2014)

 (चेतावनी - 25 वर्ष से कम उम्र  के लोगों के लिए उचित नही )


मुझे पसंद था हमेशा से लोगों के बारे में जानना , उन हालातों का विश्लेषण करना जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. आसान शब्दों में मुझे बुद्धिजीवीता प्रदर्शित करना पसंद था..क्योंकि वो मेरे अहम् को सुकून देता था... मुझे जो दूसरी चीज पसंद थी वो मेरे व्यक्त्तिव के अनुरूप तो नही थी पर बिना किसी कारण मुझे पसंद था "संभोग"..अथाह 'संभोग'...शरीर मेरे लिए भोजन से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था... किन्तु इस पर भी मेरे कुछ सिद्धांत थे...मैं विवाहित नही था..किंतु किसी महिला को प्रेम पाश में सिर्फ़ संभोग कि इच्छा के डाल देना मेरे लिए अनुचित था...मैंने कभी किसी शरीर को पाने के लिए प्रेम का सहारा नही लिया...ऐसा कुछ नही किया कि जिससे मेरी आत्मा जीवन भर ग्लानि में रहे !

अपनी आवश्यकताओं कि पूर्ति के लिए मैंने उस पेशे को चुना जो इस पृथ्वी पर सबसे प्राचीन था...मैंने वेश्याओं के पास जाना ज्यादा उचित समझा... उन लोगों को चुना जिन्हें पता था कि मुझे उनसे क्या चाहिए...मुझे उनके शरीर के सिवा उनसे कुछ नही चाहिए था, ये उन्हें भी पता था और मुझे भी...और उस पूर्ति के लिए मुझे एक कीमत चुकानी थी , जो मैं बिना टालमटोल चुकाता था... शरीर पे हक देने कि कीमत !


ये सब बिना रुके 2-3 साल चला इसी दौरान मैंने अपनी दोनों प्राथमिकताओं को जोड़ दिया ... मतलब, मैं हर उस रँडी के उस कारण को जान लेना चाहता था जिसके वजह से वो रँडी थी... मैं उन हालातों को जानना चाहता था जो रँडी के भीतर कि औरत को मार देता था...जो धकेल देता था उन्हें इस बाज़ार में जहाँ संवेदनाएँ बेतुकी थी , तुक था तो केवल शरीर का ! किसी औरत का दाम 300 था तो किसी का 30000 पर कहानी लगभग सबकी एक जैसी...संवेदनशील !


मैं रँडीओं के पास जाता , और घंटों उनसे बात करता ...एक चीज हर रँडी में सामान्य थी , वो थी उनकी अपनी कहानी सुनाने कि चाह..वो मुझे ऐसे अपनी कहानी सुनाती थी जैसे एक मासूम बच्चा अपने स्कूल कि हर एक बात स्कूल से आते ही अपनी माँ को सुनाता है.. किसी को उसके माँ बाप ने बेच दिया था , किसी को पति ने , किसी विधवा को अपने बच्चों को पालना था... एक और गलतफहमी दूर् होती चली गयीं...किसी भी रँडी का स्त्रीत्व मरा नही था , वो उतनी ही औरत थी जितनी एक सामान्य महिला...या शायद वो और ज्यादा औरत थी...इस पेशे ने उनका अपने अन्दर कि औरत से परिचय कराया था...उन्हें पता था वो क्या कर रही है ,सही क्या है ग़लत क्या है..पर हालात  उस सही ग़लत पे पारदर्शी परदा डाल देते थे।


ऐसे ही एक दिन मेरे जीवन में 'प्रनाली" का आगमन हुआ , उसके साथ 3 पहर बिताने के लिए 18000 चुकाने थे मुझे, दिवाली कि काली रात थी वो , रात 8 बजे के क़रीब उसने मेरे घर में कदम रखा. हर तरफ़ पटाखोँ का शोर था , कितु उसका आना हर विस्फोट से ज्यादा विस्फोटक था. उससे खूबसूरत महिला शायद ही कभी देखी हो मैंने, अगर स्वर्ग कि इंद्र्सभा में सचमुच मेनका , रंभा , उर्वशी ,होती होंगी तो 'प्रनाली" निष्चित उन्हीं में से किसी का पुनर्जन्म थी...उसके गुलाबी वस्त्र उसके परिपूर्ण वक्रोँ और उभारों को छुपा पाने में असमर्थ थे..रंग उसका दूध और कथ्थे से मिल के बना लगता था,उम्र कुछ 27-28 रही होगी.. न्यूनतम शृंगार उसे बाकी रंडियोँ से अलग परियोजित करता था.. तब मुझे ये नही पता था "प्रनाली" से मिलना किस सीमा तक मुझे कौंधाने  वाला है।


उस बला ने मेरी तरफ सूर्योदय की रफ्तार से आना शुरू किया , और मेरे  इतना नज़दीक आके की मैं उसकी गुनगुनी साँसे महसूस  कर सकता था , दो समानंतर प्रक्रियाएं  की।  पहली, खालिस अंग्रेजी में उसके गर्म शब्द मेरे कानों में पड़े , "So, From where to begin, Should i remove my cloths "? , और दूसरा, उसका बायाँ  हाथ अप्रत्याशित  रूप से मेरी जननेंद्रिय पे था।  एक पल लगा था उसे मेरे  लिए एक प्रश्नचिन्ह बनने में , कहाँ थी वो नाममात्र की हया जो आजतक हर रंडी में  ढूंढ निकाली  थी मैंने। उसकी हरकत उसके शब्दों का प्रसार ही तो थी , उसे पता था की वो वहां उस बंद कमरे में क्यों थी , उसे पता था उसे इतने पैसे  क्यों  दिए जाते हैं।  उसके आने के चंद क्षणों में इतना तो जान चुका था आज एक नयी तरह की  औरत से परिचय हुआ था मेरा।  मेरे दिमाग़ ने आदतानुसार न जाने कितने विश्लेषण कर डाले थे।  और उस सारे विश्लेषण के वक़्त उसकी नाज़ुक उंगलिओं ने मेरे लिंग को जकड़े  रखा था , और एक क्षण के लिए भी प्रनाली  के मुंह से रहस्मयी सम्मोहक मुस्कान गयी नहीं थी. उसकी आँखें मेरी आँखों से हटी नहीं थी , और मैं उसकी आँखों को चीर के उसके अंदर तक पहुँच जाना चाहता था , उसे पड़ना चाहता था , उत्सुकता से।  उससे ज्यादा पेशेवर रंडी से मेरा आज तक पाला नहीं पड़ा था। उसके साथ बिताया गया हर क्षण मुझे महसूस करवा रहा था की वो सबसे अलग थी.…सबसे अलग।  

हर क्षण उसे जानने की लालसा एक यंत्रणा लगने लगी मुझे, अभी भी मेरा पुरुषार्थ उसकी उँगलियों की कठपुतली बना हुआ था । ऐसे में उसने अगला कदम उठाया , और उसके होंठ मेरे होंठो को  छूने लगे।  उस क्षण  की मादकता ने मेरी उसे जानने की लालसा को दबाकर प्रनाली  को पूर्ण पाने की लालसा को सर्वोपरि  कर दिया। प्रनाली वो प्रक्रिया बनती जा रही थी मेरे लिए,  जो एक पुरुष को सम्पूर्ण बना देती है।  उसे पाने में कुछ वस्त्र बाधक थे , जिन्हे हम दोनों ने उतार फेंका।  इसी उठापठक में मेरा हाथ उसके स्तनों  पर पड़ा , ऐसा लगा हाथो में एक ऐसी गेंद दे दी गयी हो जिसे मैदे को मक्खन और दूध से  गूंदकर तैयार किया गया हो।  मैं प्रनाली से कुछ दूर हठा , ताकि उसे निहार पाऊँ। सच कहूँ तो मैं प्रनाली को टटोल टटोल के देख रहा था , की कही कुछ तो कृत्रिम निकले , पर ईश्वर शायद ही किसी कलाकृति को बनाने में इतना एकाग्र रहा होगा जितना इस मायाजाल को बनाने में।  लगा मानो भूत और वर्तमान के हर एक कवि की कविता जिसने किसी भी रूप में स्त्रीरूप की प्रशंसा की हो उसकी प्रेरणा सिर्फ प्रनाली ही होगी ।किसी औरत के कारण इतना कमज़ोर खुद को शायद ही महसूस किया था मैंने कभी।  मैंने अपने पौरष को इतना गर्वमयी कभी नहीं पाया था , इतना दृण संकल्पित.... मैं बिना कुछ बोले , समझे प्रनाली में समाता चला गया.… इतना वेगवान भी नहीं पाया था खुद को कभी मैंने …मुझे लगता था सहवास पुरुष प्रधान होता है , और स्त्री सहायक … पर इस सम्भोग गोष्ठी में खुद को बहुत असहाय , तुच्छ पा रहा था मैं.…और प्रनाली को सार्वलौकिक सत्य , वो ही उतपत्ति और वो ही निष्पत्ति।


उस सहवासीय प्रक्रिया को और अतुल्य बना रहा था , प्रनाली  का कामसूत्रीय ज्ञान। मानो सिर्फ उसी न सीखा हो कोकशास्त्र के हर पाठ का सटीक क्रियान्वयन।  कितना बौना महसूस कर रहा था उसके समक्ष मैं , मानो अम्लत्ताश को गुलाब की ख़ुश्बू आ जाये और हर एक पत्ता पेड़ से टूटकर , इच्छा मृत्य स्वीकार कर ले। उसे पुरुष शरीर के हर एक उस बिंदु का पता था , जहाँ छूने भर से पुरुष को एक ऐसा बन्दर बनाया जाया सकता था जिसे मदारी पलकों के इशारे पे नचा सकता हो.… प्रनाली वो मदारी ही थी और मैं उसका बन्दर , बन्दर अप्रिय न लगे अतः प्रनाली  का जमूरा तो मैं बन ही चुका था ।  


"तो मुझसे मेरी कहानी नहीं पूछोगे ? "प्रनाली  ने उस कामाग्नि के थोड़ा शीतल होने पे मुझसे पूछा।  "हम जैसियों से इसलिए तो मिलते हो न तुम ". मैं स्तब्धता के साथ ही आकलन करने लगा की क्या कहना चाहती थी वो।  'तो तुम जानती हो मुझे ", सिर्फ यही कह पाया था मैं।  'हाँ.…जानती हूँ मैं तुम्हे , तुम्हारे लिए रंडियाँ एक कहानी हैं बस। एक कहानी जो तुम हर बार , बार बार पड़ते हो.… हालंकि उस कहानी का अंत , शुरुआत , हर परिच्छेद, हर पंक्ति , हर शब्द पहले से जानते हो तुम।  बस हर बार चरित्रों के नाम बदल जाते हैं।  हैं न ????" मेरे मुंह से शब्द निकल रहे थे पर मष्तिष्क प्रनाली के हर शब्द के आकलन में  जुटा था , " नहीं गलत हो तुम मेरे लिए कहानी नहीं है , मैं उस दर्द को महसूस करना चाहता हूँ , जुड़ना चाहता हूँ , समझना चाहता हूँ , जो मार डालता है स्त्री के अंदर की  स्त्री को।  " 

"दर्द my foot".. एक पुरुष स्त्री को नहीं समझ सकता कभी , क्योंकि उसकी औकात ही नहीं होती। तुम केवल वो सुनना चाहते हो , समझना चाहते हो , जो बहुत obvious हो। By the way , मेरे बारे में क्या सोचते हो , क्या है मेरी कहानी ?" आखिरी पंक्ति  बोलते समय एक रहस्मयी मुस्कान देखी थी प्रनाली की आँखों में मैने। " वैसी ही है न तुम्हारी कहानी जैसी सबकी होती है , बस कुछ चरित्रों के नाम अलग होंगे।  या शायद कुछ ज्यादा सहा हो तुमने ज़िन्दगी को , शायद  बाकी सबसे थोड़ा ज्यादा।  है न ?" बड़ी विश्वश्ता  से पूछ बैठा था मैं। प्रश्न सुन ६-७ क्षण प्रनाली शांत थी उसकी आँखें सीधे मेरी आँखों में देख रही थी , चेहरे पर कोई भी भूला -भटका भी भाव नहीं था।  मुझे लगा था अब प्रनाली की आँखों से आंसू टपकने लगेंगे ,और फिर उन आंसूओं से भीगी कहानी प्रनाली को विषाद में  ले जायेगी।  पर उस ६-७ क्षण के बाद प्रनाली ने मेरे सारे कयासों को धता बता दिया। उसने बड़ी जोर का ठहाका लगाया था मुझ पे , मानो मेरा प्रश्न बुद्धिजीवी न होकर बालसुलभ हो।  मानो एक बालक अपनी माँ से पूछ बैठा हो , माँ अगली गर्मिओं के छुट्टीओं में "चंदा मामा " के यहाँ  चले क्या ? या  यूँ कहें , मैं कोई बेवकूफ था , और मुझे सारी दुनिया के सामने लज़्ज़ित करने के लिए मुझ पे हँसा जा रहा था।  इतना शर्मिंदा खुद को नहीं पाया था मैंने कभी।  एक वस्त्रहीन रंडी ने भाँड बना डाला था मुझे। 


"ठीक है सुनाती हूँ  मैं अपनी कहानी , शायद तुम्हे उतनी दिलचस्प न लगे, पर सिर्फ सच होगी", ठहाकों को रोकते हुए प्रनाली ने कहा मुझसे।  

अपनी निर्वस्त्रता छुपाने के लिए , पलंग की चादर खींच के मैं लकड़ी की कुर्सी पर  बैठ गया।और प्रनाली मेरे बिलकुल सामने पलंग पे बैठी थी उन्ही कपड़ो में जिनमे उसकी माँ ने उसे इस दुनिआ में धकेला था।  पहली बार  प्रनाली की उन आँखों में मैंने कुछ संवेदनाएं देखीं जो शायद अतीत को कहानी की शक्ल देने के प्रयास में लगीं थी। प्रनाली चिरपरिचित अंदाज़ में थोड़ा सा मुस्कुराकर बोली, "समझ नहीं आ रहा कहाँ से शुरू करूँ …OK...चलो शुरू से ही शुरू करती हूँ". मैं तैयार था प्रनाली को  चिरकाल तक सुनने के लिए।

"मेरा बचपन मेरे पिता के साथ कोलकता में गुजरा,मेरी माँ मुझे जन्म देते वक़्त गुज़र गयी थी।पापा की जान थी मैं,पापा ने कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी। पापा , मम्मी से बहुत प्यार करते थे, इसलिए उन्होंने दुबारा शादी भी नहीं की थी।हमारे दो कारखाने थे, जहाँ स्टील के ढाँचे बनते थे.एक बड़ा सा घर था , जिसमे ७-८ कमरे थे,जो मेरे और पापा के लिए जरुरत से ज्यादा थे।कमरों के आगे आँगन था और आँगन से थोड़ा हटके 1 कमरा था जहाँ हमारा ड्राइवर अमृत्य और उसकी पत्नी रंजिनी  रहते थे। रंजिनी तब २४ की रही होगी और अमृत्य ३१ का।  घर की और मेरी देखभाल रंजिनी ही करती थी। और बाहर के सारे काम अमृत्य किया करता था।रंजिनी  जिसे मैं प्यार से रंजू कहा करती थी ,दिनभर मुझे अपने और अमृत्य के प्यार के किस्से सुनाती थी।अमृत्य,रंजू को भगा के लाया था,और दोनों को एक बार देखते ही कोई भी कह सकता था की दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. 


वो बरसात की एक रात थी , मैं १३ साल की रही होउंगी तब।  रंजिनी मेरे साथ ही सोयी थी , अमृत्य को पापा ने किसी कारखाने के काम से लखनऊ भेजा था।  रंजिनी मेरे पास ही सो जाया करती थी जब भी अमृत्य को बाहर जाना पड़ता था।  रात को २ बजे के आसपास मेरी नींद खुली , रंजिनी वहां नहीं थी। मैं बाथरूम जाने  के लिए कमरे से  निकली, रंजिनी कहीं भी नहीं थी। और तब वो हुआ जो  शायद न हुआ तो मैं आज कुछ और होती।  मैंने रंजिनी के कराहने की आवाज़ सुनी , शायद वो  रो रही थी।आवाज़ पापा के कमरे से आ रही थी। दरवाज़ा बंद था , और जैसे जैसे मैं कमरे के नज़दीक पहुंची वो कराहना बढ़ता चला गया।  मैंने कुण्डी वाली जगह से अंदर झाँका, और कुछ ऐसा होता हुआ देखा जो पहले नहीं देखा था।हाँ मैंने पहली बार "SEX" देखा था।  रंजिनी , पापा के नीचे थी , दोनों बिना कपड़ो के थे. रंजिनी की दोनों टाँगे खुली थी और उनके बीच पापा थे।पापा के हाथ रंजिनी को नोच रहे थे, पर रंजिनी का कराहना दर्द के कारण नहीं था। वो कारण उस दिन मुझे समझ नहीं आया था।  मुझे समझ ये भी भी नहीं आ रहा था ,की मैं अब क्या करूँ।  मैं अगले आधे घंटे वहीँ खड़ी रही ,  तब तक , जब तक वो सब खत्म नहीं हुआ।  मैंने पहली बार किसी मर्द और औरत को बिना कपड़ो के देखा था।  मुझे पता नहीं था की मुझे क्या महसूस करना चाहिए. मैं रंजिनी के वपिस आने से पहले वपिस आके बिस्तर पे आँखें बंद करके लेट गयी.रंजिनी 15 मिनट बाद दबे पांव वपिस आयी,और आते ही सो गयी. 

मैं एक पल में बड़ी हो गयी थी ,कुछ दिन तक हर क्षण मेरे सामने केवल वो ही दृश्य रहे. जागते,सोते,ख्वाब में हर वक्त वही दृश्य .मेरे दिल में हर बीतते दिन के साथ अपने पिता से नफरत बढ रही थी, वो आदमी हर दिन रंजिनी को अपनी हवस का शिकार बना रहा था. रंजिनी को सब कुछ सहते हुए भी हर पल मुस्कुरना पड़ता था. जैसे कुछ हुआ ही ना हो. मुझे कुछ करना था , कुछ ऐसा जो मेरे पिता को एहसास दिलाये कि वो ग़लत कर रहे हैं. कुछ ऐसा जो रंजिनी को न्याय दिलाये. पापा का सामना  करने कि हिम्मत नही थी मुझमें,ना ही रंजिनी से बात करने कि. और क़रीब 8 महीने अपने मन में जलने के बाद मैंने एक निर्णय लिया . मुझे नही पता वो सही था या ग़लत पर वो मेरा ख़ुद का निर्णय था , और उसका असर जो भी हुआ उसकी जिम्मेदार में ख़ुद थी .मैंने निर्णय लिया कि पापा को भी वोही झेलना होगा , जो मैं झेल रही थी. मैंने अमृत्य के साथ "वो" करने का निश्चय लिया जो वो रंजिनी के साथ कर रहे थे. 






Continued....



Monday, February 10, 2014

बदलते एहसास ......!!!!





मेरे घरों के तालो का कुछ चोर बेनागा हिसाब रखते हैं ..
ये कलयुगी बगुले हैं , हंस मारके मोती निगलने की चाह रखते हैं ...
कुछ छिछोरे व्यंग उपदेश लगते थे हमको गीता का..
कटघरों में खड़ी हैं राधाएँ आज, सब कृष्ण दोधारी नक़ाब रखते हैं...!!(27- Nov-2013)


क्या लिख डालूं की तुझे महसूस हो दर्द-ए-उलफत करीने से..
हर हर्फ का असर यूँ हो की खून निकले तेरे भी सीने से..
आके देखे मेरे बसेरे पे बसेरा आज बाजो-चीलो का है...
रोशनी खफा है मेरे आँगन से , सिर्फ़ अंधेरा झाँकता है जीने से.!!(20-Nov-2013)

बहुत देखे थे तुझ जैसे बदन को नोचने वाले...
बहुत देखे थे तुझ जैसे बदन गोरे पर दिल काले...
तेरी आयद को सबसे जुदा , था मेहरे- खुदा माना ..
फफोले पड़ गये है अब लबों पे , दिल पड़े छाले..!!!(15-Nov-2013)


फन उठाते सान्पो को आस्तीनो में छुपाया मैने..!!
अंधेरो के माथो पे , सुर्ख सिंदूर लगाया मैने...!!
मरते मरते भी , गंगाजल नही शराब माँगी..!!
बड़ी तरकीबों से तेरा नाम भुलाया मैने...!!(11-Nov-2013)


पेशानी के पसीने को पानी समझ लिया...
मेरे चुप रहने को मेरी नादानी समझ लिया...
राहे उल्फ़त का जनाज़ा ज़रूर उठा था उस रात...
जब उदुन के बाशिन्दो को मैने "ज्ञानी" समझ लिया...!!(9-Nov-2013)


रोशनी के गर्म थपेड़े , आँख बंद कर लेने से थमे हैं कहीं???
कुछ पन्ने फाड़ लेने से जिंदगी की किताब बदली है कहीं??
कुछ नही बदलता...कुछ भी नही... सिवाय.....
रिश्ते..कुछ टीस के साथ ही सही..रिश्ते बदल ही जाते हैं....!!(29- August-2013)


ये जो उनी स्वेटर सी उलझी गमगीन तनहाईयाँ थी वीरान अंधेरों में दुबकी दुबकी..!!
इनसे कह दो की सरगोशियाँ मिली हैं हमें, इश्के-गरमाइयाँ मिली हैं हमें...!!(1-July-2013)


मैं बिक रहा हूँ टुकड़ा टुकड़ा होकर...
खरीददार मिले तो, बिना मोल बिक जाऊं..
बेखौफ समंदर तो हूँ मैं अविरल , अनंत...
तू इशारा कर तेरी पलकों में छिप जाऊं...!!!(3-May-2013)


देखो तो मेरे मकान की छत का एक कोना गायब है दोस्त...
शायद कल तूफान ज़ोरों से बहुत आया है...
अरे गायब तो वो मनी प्लांट की बेल और वो तुलसी का पौधा भी है ,
जो तब लगाया था जिस दिन देखा था उसे पहली बार..!!!(6 -Nov-2013)

उसके हिस्से से मेरी बदसलूकियाँ छीन कर , मैने उसे किसी और के नाम लिख दिया ....!!!!(25-March-2014)

जो जिंदगी होता है , उसको ढूंढने  में जिंदगी लग जाती है  कई बार !!!(3-Apr-2014)



Anupam S "Shlok"
anupamism@gmail.com
8447757188

बारीक कहानियाँ...!!!(4-July-2013)


छोटाईयाँ.....!!!!(17- Jul-2013)


आवारगी....!!! (27-Oct-2013)


बटेर...!!!!(28-Oct-2013)


अंडे वाले बिस्कट....!!!( 9-Feb-2014)


Thursday, January 9, 2014

जय महाकवि अनुपम शर्मा ....!!!(25-August-2002)



इस व्यस्त दुनिया  में रहने वाले हम भी हैं ,
नाम है अनुपम शर्मा ;
मुझसे ही प्रेरणा लेकर अपने बच्चो को ,
कवि बनाना चाहती है  हर माँ ;
वैसे तो और भी कवि इस संसार में बसते हैं ,
पर  वो तुच्छ "महाकवि" के समक्ष कहाँ टिकते हैं ;
मुझ जैसा हरफनमौला कहाँ मिल सकता सकता है जग को ,
मेरा स्थान वही है , जो मिला है अंगूठी में नग को। 
पर आज प्रसिद्धि का कारण आपको बताने का मन करता है ;
हालंकि अंतः मन बताने से डरता है ,
पर सुनिये यूंकि ये हम बोल रहें हैं ,
बोलने से पहले शब्दो को चुन चुनके तोल रहें हैं ;


मैं भी पहले नमूना सा कवि था , हालत ठीक न थे ,
कविजगत में अन्य कवि झूमर से सजे थे ;
मगर किस्मत का भी क्या ठिकाना है मिस्टर ,
बेहोश पड़े थे , खड़े होगये तनकर ;
कारण था हमें C.M. कि source मिल गयी थी ,
असल में उनकी कविता कि आदत नयी नयी थी ;
मगर अन्य कवि उनकी महाकविता सुनने से कतराते थे ,
सुनने जाते थे पदों पर , स्ट्रेचर से वापिस आते थे ;
उनकी कविता बेसिर - पैर कि हुआ करती थी ,
मगर कविता में खोट निकलने कि आदत , कवियों के प्राण हरती थी ,
मगर मेरा इरादा पक्का था , आगे बढ़ने का ,
C.M. का सहारा लेकर , कविता जगत रूपी पेड़ पर चढ़ने का ,
अतः प्रयासों से हम उनके चमचे बन गए ,
पहले बदबूदार मोज़े थे , अब गमछे बन गए ;
C.M. आवास में जाने कि छूट मिल गयी हमें ,
हम भी दिनभर रहते थे वही जमें ,
अब तो हम C.M. के प्यारे हो गए थे ;
प्रतिभा प्रदर्शन से जग में न्यारे हो गए थे ,
१ माह में ४ संकलन छप चुके थे ,
पुरस्कार लेने हेतु सूट नप चुके थे ;
तब से ही जलते हैं हमसे सभी कवि ,
मानो सितारों को मिटाने आया हो कोई रवि ,
हमारी कविता सुन बच्चे जल्दी सो जाते हैं ,
और पागल तक (ही) हमारी कविता सुनने आते हैं ;

तो , आज तुम्हे सफलता हेतु एक सूत्र देता हूँ ,
आप कि नैया को अब में खेता हूँ ,
तो बोलो एक वादा दे पाओगे ,
यदि कुछ बनना चाहते हो तो चमचे बनके दिखलाओगे ,
फल के रूप में फिर दूध मलाई खाओगे ,
फिर एक वादा कर लो तुम " मुझे नहीं भूल जाओगे" 
जय माता के साथ ही तुम , जय अनुपम शर्मा गाओगे "



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
8447757188
25-August-2002

जब तक जीवन, तब तक संघर्ष। (1-Oct-2022)

हा जीवन , तुम संघर्ष; मुझ दीन की व्यथा का व्यंग बनाते तुम , मृत्यु शैय्या पर स्वप्न दिखाते तुम , नित्य हृदय छेदन , नित्य चरित्र ह्रास, जब तक...