Friday, November 27, 2009

AMMY



"
ऐमी " यही नाम था उस प्यारी सी बच्ची का बात कोई पन्द्रह साल पहले की है जब मैंने पहली बार मुंबई में कदम रखा था तब मैं एक २२ साल का एक नवयुवक ही तो था,जो बहुत सारी महत्वाकांक्षाओं के साथ इस "सपनो के शहर " में आया था।


आते ही दोस्त की मेहरबानी से एक मराठी ब्राह्मण परिवार में एक कमरा किराये पर लिया था। बहुत ही सीधा सा परिवार था। मैंने अपने साथ लाया हुआ सामान अपने कमरे में रखा और उस वक्त मैं मकानमालिक के साथ बैठकर चाय पी रहा था जब एक आठ साल की फूल सी बच्ची भागते हुए आई और आकर मकानमालकिन से लिपट गई। पहली बार उस बच्ची की कोयल सी आवाज़ मेरे कानो में पड़ी " मम्मा वो अंकित मुझे आंटी आंटी कहकर चिड़ाता है" मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया ," तो आप उसे "अंकल " कहकर बुलाया करो " ये सुनकर उसने मुझे पहली बार देखा क्योंकि अभी तक वो अपनी बाल सुलभ शिकायतों में व्यस्त थी, और अचानक ही उसके मुंह से निकला "तुम कौन"


" मेरा नाम अनुपम और आपका "? मैंने पूछा
"अमृता" ......उसका सीधा सा और उखड़ा हुआ जवाब मिला।


उसे उसकी मम्मी ने बताया की अब मैं उनके घर में रहने वाला हूँ उसने मुझे एक बार देखा और फिर भागते हुए वो बाहर चली गई।




मुझे बताया गया की वो श्री सावंत और श्रीमती सावंत की बिटिया " अमृता " है , जिसे लाड से सब "ऐमी" बुलाते हैं उनका एक बेटा भी था , जो होस्टल में रहता था जब कभी भाई घर आता तो दोनों दिन भर लड़ने में व्यस्त रहते और अकेले रहने पर वो दिन भर उधम मचाती रहती।


शुरू शुरू में मुझे वो बहुत हैरानी से देखती रहती , जैसे मुझे वो नापसंद करती थी , शायद उसे मेरा उनके घर में रहना अच्छा नही लगता था। पर धीरे धीरे हम दोस्त बनने लगे।


२० दिन बाद तो वो कभी भी मेरे कमरे में धमकती और मुझे अपने बेतुके सवालों में उलझाये रखती। जैसे


"रात को कुत्ते क्यों भौकतें हैं"?
"क्या मच्छर का भी गुर्दा, फेफड़ा, दिल होता है "?
" जब हम सोते हैं तो हमें सपने क्यों आते हैं"?


जाने ऐसे कितने सवाल , जिनका उत्तर मुझे वाकई नही पता होता था.और मैं उसके बेतुके सवालों का बेतुका सा जवाब दे देता था।और जब भी उसे लगता की मैं " बेतुका "उत्तर दे रहा हूँ , वो अजीब सा मुंह बनाती और कहती "कुछ भी".....और फिर वो नाराज़ होकर चली जाती। मगर ये नाराजगी ज्यादा नही रहती और फिर कुछ देर में ऐमी नए सवालों के साथ हाज़िर हो जाती वैसे तो मुझे हर एक बच्चे से लगाव हो ही जाता है , मगर ऐमी में कुछ अलग ही बात थी




समय बीता , मैं नौकरी करने लगा, मैं सुबह सुबह ऑफिस चला जाता और ऐमी स्कूल चली जाती। जब मैं घर लौटकर आता तो वो खाना खाकर सोने की तयारी कर रही होती थी। ऑफिस तो छः बजे छूट जाता था मगर मैं सह्कर्मिओं के साथ गप्पें मारने में व्यस्त रहता और बाहर खाना - वाना खाकर १० बजे तक घर पहुँचता


मगर हर रविवार को हम दिनभर साथ रहते थे,एक रविवार को मैंने उसे ख़ुद की एक कविता सुनाई, उसने मुझसे हैरानी से पूछा..... " तुम ख़ुद लिखते हो "?


मैंने कहा "ऐमी मैं तो आपसे इतना बड़ा हूँ ,फिर आप मुझे "आप" क्यों नही कहते,"तुम" क्यों कहते हो "?
उसने सादगी से कहा " मैं सबको "तुम" ही कहती हूँ, और मैं कोशिश भी करती हूँ की "आप" कहूँ मगर आदत नहीं है , तो वो "तुम " ही निकल जाता है"


उस दिन के बाद मैंने उससे कभी नही पूछा की "तुम" क्यों, "आप" क्यों नहीं।


खैर एक-एक कर महीने-साल बीतते रहे,ऐमी बड़ी होने लगी और शायद समझदार भी एक दिन वो कमरे में आई और आते ही उसने मुझसे पूछा , "अनुपम आपकी कोई गर्लफ्रेंड है क्या, जिससे आप शादी करोगे ?"


मैंने मुस्कुरा कहा " मुझे कोई मिलती ही नही है,और शादी करूँगा तो उसे रखूँगा कहाँ , तुम्हारे पापा जाने मुझे किस दिन यहाँ से निकाल दें"


उसने शरमा के कहा " कुछ भी '
मैं उसे छेड़ते हुए बोला ," वैसे तुम मेरी दोस्त हो और गर्ल भी हो, यानी तुम ही तो मेरी गर्लफ्रेंड हुई"
ये सुनकर वो मुस्कुराती हुई कमरे से भाग गई।




जिंदगी चलती रही , मुझे वही रहते रहते पाँच साल बीत गए। मैंने भी थोड़ी थोड़ी बचत कर-कर के थोड़ा पैसा इकट्ठा कर लिया था अंततः मैंने एक छोटा सा फ्लैट खरीद लिया जो वहां से करीब २५ किलोमीटर दूर था।


मुझे अभी भी धुंधला सा याद है ,जिस दिन मैं सावंत परिवार का घर छोड़कर आया था ऐमी बहुत रोई थी। मुझसे तो वो इतनी नाराज़ थी की मेरे जाने के वक्त उसने कमरे में ख़ुद को बंद कर लिया था, आखिर उसका सबसे अच्छा दोस्त जो उसे छोड़कर जा रहा था।




खैर मैं नए घर में चला आया शुरू शुरू में मैं हफ्ते -दस दिन में उनसे मिलने चला जाता था ,अब ऐमी मुझसे पहले की तरह बात नही करती थी।जिंदगी की भागदौड़ में फंसने के बाद , हर रिश्ता बेईमानी हो जाता है
वैसे ही धीरे धीरे मैंने भी वहां जाना छोड़ दिया , अब कभी कभार फ़ोन पर ही बात हुआ करती थी।


दिन बीतते गए , जिंदगी अपने तरीके से मुझे चलाती रही , मेरी महत्वकांक्षाएं मुझे पर हावी हो गई , मैंने शादी भी नही की, बस अकेला ज़िन्दगी का बोझ ढोता रहा।


पिछले महीने की किसी तारीख को श्री सावंत का फ़ोन आया, हाल चाल पूछने के बाद उन्होंने बताया की, ऐमी की शादी तय कर दी गई है। लड़का U.S. में रहता है, २६ जून का लग्न है मैंने वादा किया मैं तय समय पर पहुँच जाऊँगा।




मैं २६ जून को अपना पुराना नीला कोट पहनकर घर से निकला , उनके घर के बगल वाले पार्क में ही बड़ा सा शामियाना लगा था। मैंने लिफाफा श्रीमती सावंत के हाथ में दिया, उन्होंने कहा ऐमी को विदा करके ही जाइएगा उनसे विदा ले मैं शादी के मंच के पास पहुँचा दोनों वर-वधू मंच के बीचो- बीच दो सजावटी कुर्सिओं पर बैठे थे। और लोग एक-एक कर उनके साथ फोटो खिंचवा रहे थे।


मैंने ऐमी को देखा और बस देखता ही रह गया, आज वो बिल्कुल परी लग रही थी विश्वास ही नही हुआ की ये वही ऐमी है , जो बात बात पर इतना उधम मचाती थी, वो आज बिल्कुल शांत मुंह नीचे करके बैठी थी।




खैर मैंने घड़ी पर नज़र दौड़ाई ,रात के १०:३० बज रहे थे , मैंने सोचा जल्दी से खाना खाऊं और निकलूं पर लाख जल्दी करके भी वही हुआ जिसका मुझे डर था जब मैं वहां से निकलकर बाहर आया तो वापिस जाने का कुछ साधन मौजूद नही था। अब मैं क्या कर सकता था , मैं वापस गया। कुछ देर मंच के पास खड़ा रहा ,हलके हलके भीड़ कम होने लगी पता चला सुबह तड़के चार बजे का लग्न है। मैंने दो कुर्सिओं को आपस में जोड़ा और सामने वाली कुर्सी पर पैर रखकर सोने की कोशिश करने लगा। सोना जरुरी था क्योंकि सुबह ऑफिस भी पहुंचना था।




मगर मच्छरों ने मुझे सोने नही दिया। बस किसी तरह समय बिताता रहा , कभी चाय पी और कभी मोबाइल के गाने सुनता रहा।


इतने में शादी के लग्न का समय हो गया था, ऐमी को लड़के के साथ बिठाया गया , पंडित जी मन्त्र पड़ रहे थे मैं एक किनारे खड़ा हो गया। तभी एकदम से लाल जोड़े में बैठी ऐमी ने ऊपर देखा , उसकी नज़रे एक पल के लिए मुझसे मिली। और जाने क्यों वो पल वही रुक गया, कुछ ऐसा हुआ जो मैं शब्दों में बयां नही कर सकता ।उस पल के बाद ऐमी ने नज़रें झुका लीं, और जाने किस ताकत ने मुझे वहां से धकेल दिया, मैं वहां खड़ा नही रह पाया


दूर से एक कुर्सी पर बैठकर मैं शादी देखता रहा; सिन्दूर, फेरे, सात वचन, धीरे धीरे ऐमी उस लड़के की होती चली गई।




विदाई का समय आया,सबकी आँखे नम थी, मैं भी वहीँ खड़ा हो गया ऐमी एक एक करके सबसे गले मिली, भाई , माँ, पिता...उस वक्त मुझे वाकई लगा की अब वो वाकई पराई हो गई है इतने में ऐमी मेरे सामने आई और हम दोनों ने फिर से एकदूसरे की आँखों में देखा , और फिर मैंने उसे मायके से आखिरी विदा देने के लिए गले से लगा लिया।


इतने में कुछ शब्द मेरे कानो में पड़े.....वही कोयल सी आवाज़...." मम्मा वो अंकित मुझे आंटी आंटी कहकर चिड़ाता है"......वही शिकायत भरी आवाज़....


वो शब्द थे " Anupam....I had a huge crush on you......"












Regards
Anupam S.
(26-27 Nov 2009)
9757423751

Tuesday, October 20, 2009

दोनों छोरो पर

दोनों छोरो पर(19 Oct 2009)







एक नदी के दोनों छोरो पर खड़ा मैं,
कभी इस पार से देखता हूँ, कभी उस पार से,
ये द्वंद व्यक्तित्व को जानने का है,
ये द्वंद स्वयं को पहचानने का है;
कभी परिस्थितियां विकट हो जाती हैं , कभी मेरे विचार;
कभी स्वयं को छेदना पड़ता है, कभी उलाहना ;

फिर भी दोनों छोरो पर खड़ा मैं, एक बात तो जानता हूँ,

मैं दोनों छोरो पर खड़ा हूँ , यही मेरी जीत है ,
मैंने तथ्य पर प्रश्न किया है , यही मेरी जीत है,
पर कभी जीतना महत्वपूर्ण नही लगता , कभी दोनों छोर;
मैं ये जानता हूँ , बहाव तेज़ है, पर पार करना है,
कल शायद मैं न रहूँ , बहाव न रहे , या न रहें दोनों छोर,
पर जो रहेगा , वो अलोकिक होगा , वो अनुपम होगा,
शायद मैं वो पा सकूँगा , जो मैं पाना चाहता हूँ,

पर अभी तो मैं ये भी नही जानता , कि मुझे पाना क्या है.....?




Regards
Anupam S.
(SRC 2009)
8447757188

Thursday, October 1, 2009

Anupamism Bollywood TOP 25

Top 25 Bolywood Actors (Not Including Parsi Style actors,i.e., Prithvi raj kapoor)






1) Amitabh Bachhan
2) Dilip Kumar
3) Amir Khan
4) Sharukh khan
5) Nana Patekar
6) Anil Kapoor
7) Balraj Sahni
8) kk menon
9) Om Puri
10) Nasiruddin Shah
11) Anupam Khair
12) Tabbu
13) Nutan
14) Madhubala
15) Aloknath
16) kamal hassan
17) Sanjiv Kumar
18) Amjad Khan
19) Sridevi
18) Vikram Gokhale
19) Om Prakash
20) Kulbhushan Kharbanda
21) Irfan Khan
22) Manoj Bajpeyi
23) Rajesh Khanna
24) Pankaj Kapur
25) Paresh Rawal






* Numbers are not Ranking.

Monday, June 8, 2009

रास्ट्रीय नाट्य विद्यालय(NSD) एक ढकोसला

एक थिएटर स्टुडेंट होने के नाते हमें हमेशा बताया गया है की , भारतीय थिएटर में NSD का क्या महत्व है। और उसमे होना कितने गौरव की बात है । कल तक मै यही मानता था , पर जिस तरह की मानसिक प्रतारणा , पिछले दो दिन में मुझे इस संस्था की वजह से मिली है , मेरी सोच पूरी तरह बदल चुकी है।




इस लेख के माध्यम से मैं किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी नही करना चाहता , अपितु कला का ठेकेदार बन बैठी इस संस्था के ठेकेदारों को सहज भाव से ये एहसास दिलाना चाहता हूँ , कला किसी व्यक्ति या संस्था की पूँजी नही है, और उसपर अपना एकाधिकार समझना छोड़ दें।


आज केवल इस संस्था की वजह से मै प्रण ले चुका हूँ की जीवन भर थिएटर नही करूँगा . जो व्यक्ति अपने क्षेत्र में थिएटर को लाना चाहता था , उन लोगो के बीच जो थिएटर शब्द से ही वाकिफ नही हैं , आज इस तरह का प्रण लेने के लिया मजबूर हो चुका है कारण है NSD की तानाशाही






सर्वप्रथम ,NSD प्रवेश प्रक्रिया के प्रपंच के सम्बन्ध में टिप्पणी करना चाहूँगा , क्योंकि अभी तक NSD प्रवेश को अत्यधिक महत्व दिया जाता रहा है । पर अब जब मैं इस प्रवेश प्रकिया में मौजूद अव्यवस्थाओं का स्वतः ही साक्षी हूँ , तो जरूर इसका रस्सावादन सबको करवाना चाहूँगा।




सर्वप्रथम स्पष्ट कर देना चाहूँगा , की इसको चलाने वाले चाहते है , की इसमे प्रवेश के लिए हजारो प्रविष्टिया आयें । इसलिए केवल प्रवेश प्रक्रिया (२००९) पर Advertisement के लिए ही आठ लाख रुपये फूक दिए गए पर कुल प्रविष्टियाँ आई 600 । जबकि पूर्व में ये संख्या कही ज्यादा हुआ करती थी । खैर इसमे से ज्यादातर प्रविस्टिया Delhi के लिए आई थी, यानी देश के दूरदराज क्षेत्रो में अभी भी थिएटर को पहुँचाने में ये दिग्गज संस्था कुछ नही कर पायी है , और Delhi में थिएटर के लिए इस संस्था का ही केवल योगदान नही है।


खैर Delhi केन्द्र में Audition के लिए तीन दिन नियत करे गए 4, 5 और 6 जून २००९। जिसमे कुल 215 लोगो को बुलाया गया , पर जिसके लिए बेहद दोयम दर्जे के इन्तजाम किए गए थे । Audition शुरू होने के कुछ देर बाद ही काफ़ी छात्रों से कह दिया गया " तुम लोग कल आना "


जल्दी जल्दी में ऑडिशन ख़तम किए गए , क्योंकि NSD Faculty को 3rd year के एक छात्र का डिप्लोमा Productions देखना था  था अगले दिन सुबह आठ बजे फिर से ऑडिशन शुरू किए गए ,पर जिस तरह से Audition हुए उसका भगवान् ही मालिक है ।


मैं भी इस रेलमपेल ऑडिशंस का साक्षी रहा , मुझसे कहा गया जो तैयार करके लाये हो दिखाओ ,उसके बाद मुझसे जाने को कह दिया गया । मैंने अचम्भे से जूरी की तरफ़ देखा और कहा " पर हमसे तो नाटक और थिएटर साहित्य पड़ने को कहे गए थे, और आप उसपर परिचर्चा करने वाले थे" । जवाब में मुझसे कहा गया की "नही आप जाओ"


मैं अचंभित था , क्योंकि उन्होंने मुझसे कुछ भी बात नही की थी , और न जाने उन्हें कैसे पता चला की मैं कैसा व्यक्ति हूँ , एवं थिएटर से किस हद तक प्यार करता हूँ।


आप इसे मेरा घमंड मान सकते हैं, पर मैं दावे के साथ कह सका हूँ , की थिएटर एवं साहित्य का मैंने अच्छा खासा अध्ययन किया है ,जिसके कारण आप मुझे बिल्कुल भी नवोदित नही मान सकते । रही बात परफॉर्मेंस की तो उसे भी मैं अच्छी की श्रेणी में तो रख ही सकता हूँ।


वहां की व्यवस्था देखकर भी मैं दंग रह गया , क्योंकि आप वहां पर कत्थक करे या Break डांस आपको ढोलक और हर्मोनिअम पर ही करना था


मेरे एक दोस्त के ऑडिशन के वक्त तो एक मुख्य जूरी मेंबर ने वहां बैठना भी मुनासिब नही समझा । दोस्त मुझसे बोला "यार मुझे पता नही वो लोग मुझे जज कैसे करेंगे क्योंकि उन्होंने तो मुझे देखा तक नही। "


खैर उन दिगज्जो ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए दूसरे दिन रात के 1:30 बजे तक ऑडिशन लिए , पर इसलिए की किसी भी तरह भीड़ ख़तम हो जाए । और ये सोचे बिना की लोग दूर प्रदशो से आए हैं , और आपने उन्हें सुबह आठ बजे से बैठा रखा है , ऐसे में पन्द्रह घंटे से इंतज़ार कर रहे आवेदक से आप क्या आशा लगाते है की वो क्या परफोर्म करेगा ।


खैर अगले दिन 6 जून को जूरी के एक प्रमुख सदस्य को विदेश जाना था तो ऑडिशंस को विगत दिनों से भी ज्यादा तेज़ी से निपटाया गया और अंततः रात 10:30 बजे रिजल्ट चस्पा कर दिया गया।पर जिसे देखकर सभी के होश फाख्ता हो गए।


जो लोग होने चाहिए थे , वो बिल्कुल नही थे ; और जो लोग बिल्कुल नही होने चाहिए थे वो थे । हमें समझ आ चुका था , की NSD मैनेजमेंट को थिएटर से कोई लेना देना नही है । और न ही उन्हें योग्य व्यक्ति की तलाश रहती है , अपितु वो तो सिर्फ़ ऐसे व्यक्ति चाहते है जिन्हें वो तीन साल अपने पास रख सके ,और वो छात्र उनकी किसी बात का खंडन न करें , दब कर रहें । इसीलिए ऑडिशंस में ख़ास ख्याल रखा जाता है की , अगर किसी भी व्यक्ति में अगर leadership quality दिखे तो न लिया जाए,उन्हें ऐसे व्यक्ति चाहिए जो उनकी उनकी सुनते रहें । और कोई भी छात्र NSD प्रबंधन के " अच्छे " प्रबंधन में रोड़ा न बने ।


खैर उनके इस So called रिजल्ट ने कइओं के ह्रदय में इस संस्था के प्रति नफरत भर दी।


कई सूत्र तो ये भी कहते थे की, कुछ सीटों का बटवारा कई " मठाधीश" पहले ही कर चुके होते हैं।




खैर इसके अलावा भी कई मुद्दे ऐसे है , जो इस भारी भरकम बजट वाली इस संस्था के अस्तित्व पर ही सवाल उठाते है।


जहाँ एक तरफ़ बाहरी थिएटर Groups 1 -1 रुपये के लिए मोहताज़ है , वही NSD स्टूडेंट्स productions पर दस - बारह लाख रुपये खर्च करता है । उसके बाद भी शो में केवल Stage , Direction , Music ही दिखता है , ऐक्टर नही ।




NSD मैनेजमेंट से ये बात पूछना चाहूँगा की वो "STREET THEATER "या "THIRD THEATER" जैसे Concepts को क्यों Student Productions में शामिल नही करते । वैसे इस सवाल का जवाब वो न भी दे तो भी हम उत्तर जानते ही हैं ।


मैनेजमेंट Workshops आयोजित कराने के लिए भी उन्ही व्यक्तिओं का चयन करता है जिससे उनके घनिष्ट सम्बन्ध हो।


इस लेख के माध्यम से मै भारत सरकार का ध्यान इस संस्था पर आकर्षित करना चाहूंगा , जो अपनी मनमर्जी कर रही है , और सुनने में आता है की NSD कला को फैलाने वाली श्रेष्ठ संस्था है


ये बात जान लेनी चाहिए की अगर हम कला को वाकई में फैलाना चाहते हैं , तो दकोसले बंद करे, और वाकई में कला के प्रति एक प्यार पैदा करे , तभी हम एक बेहतर कला की और समाज की आशा कर सकते हैं ।










Regards
Anupam S.
(9757423751 / 9619499813 )
anupamism@gmail.com
(SRC 2009)

Friday, June 5, 2009

सादिया

सादिया ने फिर मोबाइल की तरफ़ देखा , वो चाहती थी की वो मोबाइल की तरफ़ न देखे , पर अब वो निर्णय नही ले पा रही थी , की कौन सी चाहत उस पर ज्यादा हावी है।

16 वीं बार उसने मोबाइल को उठाया , ओर वही मेसेज पड़ने लगी , जो वो पिछली 15 बार पड़ चुकी थी , केवल तीन ही शब्द तो लिखे थे " I LOVE YOU " और भेजने वाले का नाम लिखा था "अंकुश"

एक मेसेज ही तो था , मगर वो उसे अन्दर तक झकझोर रहा था , हर बार की तरह उसने मोबाइल फिर किनारे रख दिया , और तभी घड़ी ने रात के दो बजाये । वो सोचने लगी , मगर वो ये भी नही जानती थी की उसने सोचना क्या है।

जब से वो कुछ समझने लायक हुई थी , तब से वो सिर्फ़ एक ही चीज़ वो जानती थी , की वो अंकुश से बहुत प्यार करती है। अंकुश सक्सेना , उसका पड़ोसी ,उसका क्लासमेट , उसका एकमात्र दोस्त , उसके लिए उसका सबकुछजिसे वो कब से चाहती थी , वो ख़ुद भी नही जानती थी। जिंदगी में किसी का नाम लेकर वो आह भरती थी तो वो अंकुश ही तो था ।

उसने कभी नही सोचा था की वो " सादिया मुश्ताक " है , और वो "अंकुश सक्सेना"

वो तो उसके लिए समाज को भी छोड़ सकती थी , पर .....पर वो एक लड़की थी ,और वो अपनी अपनी मोहब्बत का इज़हार कभी ख़ुद नही कर पायी थी .....वो जानती थी अंकुश भी उसे चाहता था , पर...पर न जाने क्यो उसने भी कभी सादिया से कुछ नही कहा था ।शायद सदिया कि तरह वो समाज से लड़ने कि हिम्मत नही रखता था।


और आज उसने ये मेसेज किया था " I love You", आज जबकि कल उसका निकाह है आसिफ के साथ । सादिया ने कभी ख़ुद को इतना बेबस महसूस नही किया था। आख़िर कब तक इंतज़ार करती वो , इंतज़ार भी उसका जो शायद कभी होना ही नही था।

सादिया उठी फ्रिज से उसने एक घूँट पानी पिया और फिर आक़र लेट गई ....."क्या करूँ मैं "....." क्या अंकुश के साथ भाग जाऊं'...."या फिर अम्मी या अब्बू से बात करूँ "...." या फिर आसिफ से कह दूँ".......इसी उधेङबुन में उसे कब नींद आ गई उसे पता ही नही चला ।

सुबह 6 बजे अंकुश का मोबाइल बजा , उसने देखा सादिया का मेसेज आया था। लिखा था " तू हिंदू है और हम मुसलमान अगर तूने कभी सादिया कि तरफ़ आँख उठाकर भी दुबारा देखा तो तुझे काट के फेंक देंगे। " भेजनेवाला " सादिया का भाई असलम "

उधर सादिया गुमसुम अकेली बैठी थी , उसने मोबाइल उठाया और Sent Message से ये मेसेज डिलीट कर दिया । फिर INBOX में आक़र अंकुश का मेसेज " I LOVE YOU " एक आखिरी बार पढा़ और उसे भी डिलीट कर दिया ..उसकी आँखों में आंसू थे ।



Regards
Anupam S.
(SRC 2009)
9757423751

जब तक जीवन, तब तक संघर्ष। (1-Oct-2022)

हा जीवन , तुम संघर्ष; मुझ दीन की व्यथा का व्यंग बनाते तुम , मृत्यु शैय्या पर स्वप्न दिखाते तुम , नित्य हृदय छेदन , नित्य चरित्र ह्रास, जब तक...