Friday, March 6, 2009

आभास

एक प्रयास , एक तरंग , एक आभास ,अभिवादन.......



तेरी यादों के तकिये पर मैं सर रखकर के सोता हूँ,
मैं हँसना चाहता हूँ हर घड़ी , हर वक्त रोता हूँ ,
कफ़न मेरा हमेशा पास ही थैले में रहता है,
मेरी मय्यत पे तू आएगी ये सपने संजोता हूँ।

तेरा रोना मेरी रानी मुझे गमगीन कर देगा,
तेरा यूँ इस कदर हँसना कसम से जान ले लेगा,
तू रोदे या सनम हंसदे हमारी जान जाना तय ,
ओर जो कुछ नहीं करती तो दिल से कौन खेलेगा।

जब मेरे साथ होती हो, तब मैं कुछ कह नहीं पता,
तब न मैं जिन्दा होता हूँ ,और सनम मर नहीं पता,
मेरी हर साँस कहती है , तू मेरी है , तू मेरी है,
ये बदन चीखता है , पर लबों से कह नहीं पता।

मेरी हर बात को तुम क्यों सनम दिल पे लगाती हो,
मैं प्यासा हूँ तुम्हारे प्यार का तुम क्यों सताती हो,
मेरे हर ख्वाब में आती हो ,जैसे रात की रानी ,
कभी तो दूर रहती हो ,कभी आंसू बहाती हो।

मैं सूरज की तरह जलता हूँ उसकी याद में यारो,
कभी मैं दौड़ पड़ता हूँ, कभी चलता नहीं यारो,
मैं जब भी साँस लेता हूँ तो मुझको दम नहीं आता,
मैं हूँ जिन्दा या मुर्दा हूँ , अब मुझे क्या पता यारो।

तेरा वो रात को पन्ने पलटना याद आता है,
तेरी आँखों का काजल , गाल का तिल याद आता है,
मेरी बाँहों में तेरा खिलखिलाना किस कदर भूलूं,
जनाजे पर मेरे , तेरा न आना याद आता है।

मेरी साँसे थमी हैं, दिल रुका है, जान बाकी है;
मैं हूँ साईल, न है साहिल , अभी तक शान बाकी है,
तेरी बातों में आकार , अब कभी मैं प्यार न सोचूं,
हड्डिया गल चुकी हैं,खून गायब, खाल बाकी है।

ऐ, दुनिया तुने मुझको जो सिखाया , वो भला चंगा,
गम के सागर मिले हैं, पर नहीं है प्यार की गंगा,
तू मेरी सोच में है, शब्द में है, गूँज में बाकी ,
जो मेरी जिंदगी था, बन चुका है, खेल और धंधा।


अनुपम S. "Shlok"
8447757188
anupamism@gmail.com

Thursday, February 12, 2009

Good bye Mr. Aiyer...

इस नए साल में मैं एक मूवी देख रहा था Mr And Mrs Aiyer...
जिसके बारे में काफ़ी कुछ सुना भी था .....तो रात ११:०० से २:०० बजे तक Mr And Mrs Aiyer' देखता रहा...यानी २००९ की शुरुआत मैंने इस मूवी से की....फ़िल्म खत्म हुई इन आखिरी शब्दों के साथ " Good bye Mr. Aiyer...


क्योंकि मैं एक acting student हूँ ....इसलिए हमें सिखाया जाता है...की चीजों के विभिन् आयाम ढूंढने की कोशिश करो....साथ ही मैं ख़ुद ये मानता हूँ....सबसे अच्छा वर्णन वो होता है जब आप के पास शब्द ही न हों।

ऐसी परिस्थिति में से ही साहित्य का जन्म होता है जब , उसको शब्दों में बांधना असंभव हो .....।

ये आखिरी पंक्ति इतना कुछ कहती थी की , मुझे लगा शायद मेरे पास शब्द कम पड़ जाए....अलविदा कहने का उससे खूबसूरत लम्हा शायद ही कभी जीया था मैंने.....मैं अपने टीवी स्क्रीन के अन्दर पहुँच जाना चाहता था उस वक्त ....उस लम्हे को और करीब से देखना और जीना चाहता था मैं....उसी वक्त रात को २:३० बजे ये पंक्तिना मेरी कलम से निकली , जो साल की पहली पंक्तियन या पहली क्रिया भी थी.....आज वोही पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.....





क्या कहें और क्या कह सकते हैं,
१ धागा जो रेशम से बना है;
जो लिपटा है चारों तरफ़ ,
न वो धागा टूट ही सकता है,
और बेचारी सूई के पेट में तो छेद ही नहीं...
साँसे चलती हैं रुकने के लिए......
और रूकती हैं एक अंतराल के लिए;
वो अंतराल , जो बस खत्म हुआ ही समझो,
पर क्या कहें.......
वो अंतराल में जीना चाहते हैं ।


एक रिश्ता , जिसका कोई नाम नहीं ,
मानो शब्दकोष के शब्द कंगाल हैं,
और वो रिश्ता जो पावन भी तो नही,
या पावन की परिभाषा गूढ़ है ;
आँखें दोनों की थमी सी...
साँसे , थोडी चली कभी , कभी रुकी सी;
दोनों एकसूत्र में बंधे से....
पर...पर ये क्षणिक भ्रम है ।
भ्रम जो खत्म हुआ ही समझो।
पर क्या कहें.....
वो भ्रम को ही जीना चाहते हैं।


मैं इस पार हूँ , मेरी संवेदना उस पार,
ये क्षण अपूर्ण हैं ,मानवीय कृति का आधार;
ये विडम्बना है एक, या खूबसूरत लम्हा,
जिसमे मैं जिया हूँ,और वो ख़ुद में साकार;
होंठ हिले, शब्द निकले, मैं निशब्द,
ये क्या....वो यादें भी वापस दे गया...?
यानि..यानि..., जीने का सहारा यादें नही होती।
और वो यादों में नही जीना चाहते हैं
और आखिरी शब्द आते हैं.......
"Good bye Mr. Aiyer....."


अनुपम S.
(Anupamism Rocks)
9757423751
anupamism@gmail.com

Tuesday, February 3, 2009

आयाम......

तुम्हे देखता हूँ .....!(24-Mar-2008)




तुम्हे देखता हूँ, और फिर तुम्हारे आसपास देखता हूँ....
हाँ नफरत करता हूँ.....
बहुत नफरत करता हूँ.....
नफरत करता हूँ ,उस हवा से जो तुम्हे छु के जाती है .....
नफरत करता हूँ , उस पानी से ,जो तुम्हारे होंठो को छूके;
तुम्हारे हलक से नीचे चला जाता है....
कैसे माफ़ करूँ सूरज की रोशनी को,
जो तुम्हारे सुर्ख गालों को छूके और सुर्ख हो जाती है.....
तुम्हारी साँसों से जलता हूँ , जो हर वक्त तुम्हारे साथ रहती हैं .....


अब बस एक ही ख्वाइश है , की जब मैं मरुँ ,
तो मेरी राख को तुम अपनी आँखों में काजल की तरह लगा लेना....
ताकि कुछ देर के लिए ही सही , तुम्हारी आँखों में डूब तो पाऊंगा .....
तुम्हे देखता हूँ, और फिर तुम्हारे आसपास देखता हूँ....









आखिरी पल....(7-4-2008)







आज आखिरी दिन था , शायद जीने का .....
वो आखिरी पल था शायद , साँस लेने का....
जब वो सीढ़ीयां ख़तम हुई ,और.....
तुम्हारी आँखों ने मेरी आँखों को देखा.....


मेरी आवाज़ ही नही , साँसे भी बहुत कुछ कहना चाहती थीं ....
लेकिन क्या करूँ वो एक बात है जो ख़तम ही नहीं होना चाहती....
कैसे यकीं दिलाऊँ तुम्हे की मैं ग़लत हो सकता हूँ , मेरा इरादा नहीं....
कब तक तड़पूं या कब तक याद करता रहूँ,
तुम्हारे हाथो के उस एहसास को....
जो मेरे हाथों में खुशबू की तरह बस गया है......


हाँ शायद कुछ गलतीओं की कोई माफ़ी नही होती ....
लेकिन ......
"तुम झूठ बोल सकती हो तुम्हारी आँखें नहीं....
और उन्होंने तो उस दिन भी झूठ नही बोला था...."











Anupam S. Shlok
SRCian
8447757188
anupamism@gmail.com



Friday, January 30, 2009

"सपना- एक परी का"


मैंने एक सपना देखा। एक सपना जो एक सपने सा ही लगता था। क्योंकि वो मेरी सोच, मेरे विचार के आखिरी छोर के अंत तक जाता था ।
उस सपने में मैंने एक "परी " को देखा ,एक परी जो शायद गाय के दूध के मक्खन से बनी थी ,
जिसके होंठ संतरे की फांको जैसे थे, उसकी भौओं को देखकर अमावस्या का चंद्रमा याद आता था ,उसकी गर्दन थी या नक्काशेदार सुराही , पता नही चलता था।


मैंने उसे एक बार देखा और फिर उसपे से नज़रे हटाने की हिम्मत नही कर सका । उसकी आँखें उन आँखों की बात करती थी जिनके लिए शहजादे भिखारी हो जाएँ ।


मैंने सोचा काश एक बार जाकर परी के पंखो को सहलाऊँ ,और तब तक सहलाता रहूँ ,जब तक परी को नींद न आ जाए,और वो मेरी गोद में सर रखकर सपना देखने लगे। एक ऐसा सपना जिसमे मैं उसका सपना बन जाऊं । मैं ये ही सोच रहा था , मेरी आँखे बंद थीं या यूँ कहें मैं जागती आँखों से सपना देख रहा था ।


तभी मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा ,ऐसा लगा किसी ने मुझे नींद से जगाया हो । मेरे सामने वोही परी खड़ी थी । मैंने उसके गालों को छूके देखा ,ये जानने के लिए की कही मैं सपना तो नही देख रहा।मगर ऐसा करने से उसके गालों पर मेरी उंगलिओं के निशान पड़ गए।


उसने देखा मेरी और , उसके होंठ हिल रहे थे । मुझे नही पता उसने क्या कहा , क्योंकि मुझे तो उन होंठो का हिलना एक खूबसूरत सपने का सा एहसास दिला रहा था। एक बार उन हाथों ने मुझे फिर छुआ । मुझे जागती आँखों के सपने से जगाने के लिए , उन मखमली हाथों को मुझे जोर से हिलाना पड़ा।


ये शायद उन हाथों के एहसास का जादू था , या फिर उन संतरे की फांको जैसे होंठो के हिलने का असर ,या शायद परी के बदन की खुशबू। जिसके असर से मैं सपने से जाग गया पर एक बार फिर से सपनो में खो जाने के लिए।


क्योंकि......क्योंकि.....क्योंकि...परी ने मुझसे बात की...शायद मैं सपना देख रहा था । उसने बांसुरी की सी आवाज़ में मुझसे पुछा "तुम्हारा नाम क्या है अजनबी?"
मुझे नही मालूम था की मैं क्या करूँ , मैं उस सवाल का जवाब नही देना चाहता था , क्योंकि मैं सिर्फ़ उन्ही शब्दों की गूँज के सहारे कई जिंदगियां बिता देना चाहता था । अगर मेरे होंठ हिलते जवाब देने के लिए तो उनसे निकले शब्द शायद उस गूँज की खूबसूरती को खूबसूरत नहीं रहने देते । पर क्या करता मैं उस प्रश्न का जवाब दिए बिना रह भी तो नही सकता था,जवाब न देकर मैं परी के चेहरे पर उदासी की एक भी लकीर नही देखना चाहता था. मुझे न चाहते हुए भी जवाब देना ही पड़ा।

मैंने कहा " मैं सपनो का सौदागर "।

परी ने फिर से मुझसे मुस्कुराकर पूछा, "किस चीज़ का सौदा करते हो"।

मैंने कहा " सपनो का"।

"किस चीज़ से" परी ने फिर पूछा।

मैं क्या कह सकता था , मैं वही बोला जो उन आँखों ने मुझसे बुलवाया ,"सपनो का सपनो से, एहसासों का एहसासों से, खुशबुओं का खुशबुओं से "।

" इनमे से तुम्हे क्या चाहिए", मैंने परी से पूछा।

परी ने बड़ी सादगी से कहा," अगर मैं तुम्हे बताऊँ की मुझे क्या चाहिए तो क्या तुम मुझे वो दे सकते हो, बदले में मैं एक बार तुम्हारे माथे को चूमुंगी। "
एक पुजारी को क्या चाहिए ? केवल उसके भगवान का आशीर्वाद।
एक नदी को क्या चाहिए? बस सागर की गोद।
एक भंवरे को क्या चाहिए? बस फूलों की मिठास।

अब इसके बदले में परी ने मुझसे पूरी दुनिया भी मांगी होती, तो भी मुझे देनी ही थी
आखिरकार उसके होंठो ने मेरे माथे को छुआ , वो एहसास जो कई जन्मो तक मेरे साथ ही रहने वाला था। वो शायद एक सपना ही तो था।
थोडी ही देर में परी के हाथों में वो था, जो उसने माँगा था । जिससे वो खेल रही थी ,कभी उछालती थी , कभी जमीन पर मारती थी , कभी चूमती थी कभी साफ़ करती थी ।
वो था "मेरा दिल।"
पास ही में मैं पड़ा था , मेरे होंठो पर मुस्कान थी, मेरे हाथों पर उस छुअन का असर था। मेरे माथे पर था होंठो का निशान , अगर नही थीं केवल दो चीज़ें " एक मेरे सीने में दिल और दूसरी मेरे जिस्म में जान"
पर परी थोडी ही देर में उस दिल से उबने लगी ,उसने एक बार दिल को बड़े ध्यान से देखा, आखिरी बार , और फिर उसने दिल को अपनी दायीं तरफ़ जोर से उछाल दिया ।


मेरा दिल अभी भी वहीँ पड़ा था, नही....नहीं.... जमीन पर नहीं, बल्कि ढेर पर सबसे ऊपर, उस ढेर पर जहाँ सैकडो दिल पहले से पड़े थे।


मैं अब भी दूर पड़ा " सपना" देख रहा था



अनुपम S.
(Anupamism Rock)
9757423751
anupamism@gmail.com







Tuesday, January 27, 2009

BHARANGAM - भारत रंग महोत्सव


गत ७-१९ जनवरी तक देल्ही और लखनऊ में ११ वां भारंगम मनाया गया.....
मैंने पूरे भारंगम को कुछ पंक्तिओं में समेटने का प्रयास किया है......






कविता का शीर्षक है "मैं भारंगम हूँ "।



________________________________________________
मैं कला हूँ, मैं संस्कृति हूँ,मैं विचार हूँ, मैं आन्दोलन हूँ।
मैं भारंगम हूँ।


मैं जोहरा की जवानी हूँ,
मैं अनुराधा ,अमाल की रवानी हूँ,
मैं स्वरंगी की शैतानी हूँ,
मैं नाटक , नृत्य ,कहानी हूँ,
मैं भारंगम हूँ।
मैं श्यामानंद का नन्द हूँ,
मैं आनंद हूँ स्वानंद हूँ,
मैं शांतनु का विचार हूँ,
मैं क्रोध,श्रृंगार, सदाचार हूँ
मैं भारंगम हूँ।
मैं ticket, paas , invitation हूँ,
मैं NSD की creation हूँ,
मैं जज्बा हूँ आगे बदने का,
मैं मौका रूदिवाद को तोड़ने का,मैं भारंगम हूँ।
मैं रामगोपाल की लैला हूँ,
मैं कापूची का खाली थैला हूँ,
मैं कभी स्वेतरंग , कभी मैला हूँ,
मैं थोड़ा हूँ पर नहीं अकेला हूँ,मैं भारंगम हूँ।

मैं विशेष आलोकिक अनुभूति हूँ,
मैं जुलेखा चौधरी की कृति हूँ,
मैं आह्वान हूँ आगे बदने का,
मैं श्रोत हूँ शौर्य हूँ लड़ने का ,मैं भारंगम हूँ


मैं मंटो के शब्दों की ताकत हूँ,
मैं हाशमी की सहादत हूँ ,
मैं धूप हूँ ,मैं छावं हूँ ।
मैं शहर हूँ , मैं गाँव हूँ ,
मैं भारंगम हूँ।
मैं बहुमुख , सम्मुख, अभिमंच हूँ,
मैं LTG, कमानी ,SRC रंगमंच हूँ,
मैं NSD प्रवेश का प्रपंच हूँ,
मैं FOOD COURT का लंच हूँ,
मैं भारंगम हूँ।
कभी मैं छोटा बच्चा सा,
कभी झूठा , कभी सच्चा सा,
सहादत हसन का "ठंडा गोश्त" हूँ,
मैं अनुज, अग्रज हूँ, दोस्त हूँ,

मैं भारंगम हूँ।
मैं इस्तांबुल भी लाहौर भी हूँ,
मैं कहीं नहीं हर ठौर भी हूँ,
मैं हूँ गिरिजा के सपनो सा,
छु के देखो ,हूँ अपनों सा,
मैं भारंगम हूँ।

मैं मह्रिषी का भव्य मंच हूँ,
मैं डाकघर का सरपंच हूँ,
मैं LA PREMIERE FOIS हूँ abstract सा,
कभी आतिगूद "The Rest" सा ,
मैं भारंगम हूँ।
कभी मैं एक आवाज़ हूँ,
उस आवाज़ का स्वर हूँ,
उस स्वर की गूँज हूँ,
उस गूँज का रस हूँ,

मैं भारंगम हूँ।


मैं अस्तित्व हूँ, रंगमंच का,
मैं अभिप्राय हूँ, रंगमंच का,
मैं प्रसंग , व्याख्या , निष्कर्ष हूँ,
मैं आनंद हूँ, आतिहर्ष हूँ,
मैं भारंगम हूँ।

मैं आप में हूँ, मैं भारंगम हूँ,
आप मुझ में हैं,
मैं भारंगम हूँ,
मुझे सहेज के रखना ,
मैं भारंगम हूँ,
मैं फिर आऊंगा ,मैं भारंगम हूँ,
मैं भारंगम हूँ।

____________________________________________________

कल २६ जनवरी को मुझे पता चला की God does exist.


Regards

Anupam S.
(Anupamism Rock)
9868929470
anupamism@gmail.com

Monday, December 8, 2008

जीवन क्या है कोई न जाने , जो जाने पछताए.....!!

कई बार सोचता हूँ ज़िन्दगी और मौत में से ज्यादा खुबसूरत क्या है ।
ज़िन्दगी या मौत


जिंदगी एक एहसास भर है , शायद एक भ्रम है या शायद एक ऐसी ऐसी सच्चाई , जो सच और झूठ,या भ्रम और परमसत्य की बीच कहीं डोलती है॥


वहीँ मौत एक अंत है या एक शुरआत है॥
एक शुरुआत एक अंत की या अंत एक शुरुआत का...




मुझे लगता है ज़िन्दगी और मौत दोनों ही बहुत खुबसूरत हैं..... सिर्फ़ परेशानी दायक तो वो transitioning period है , जो हमें जीवन से मृत्यु की और ले जाता है ।




उस वक्त न तो हम जब जिन्दा ही होते हैं और मरना तो हम कभी चाहते ही नहीं , बस किसी अदृश्य और गूद फलसफे के सहारे मृत्यु और जीवन के मध्य हिचकोले खाते हैं।


क्या मौत इतनी भयानक होती है,
नहीं मौत आपको जीवन के अस्तित्व का मतलब समझाती है, मौत समझाती है की जीवन का मतलब क्या है




कहा है किसी ने
" ज़िन्दगी से मिल गया , तो भी क्या मिल जाएगा , इससे जिस दिन छूट जायेंगे खुदा मिल जाएगा"

मैं नहीं कहता की "जीने से शिकायत है तो मर क्यो नहीं जाते" बल्कि मैं सिर्फ़ कहता हूँ की " लोग जीते ऐसे हैं जैसे कभी मरेंगे नहीं " ।






क्यो मौत १ डर है , या शायद १ डर भी नहीं , क्योंकि डर उससे होता है जो हमारे सामने होता है , या जिसके कभी न कभी सामने आने का कोई अंदेशा होता है किंतु ये क्या " जब हम होते हैं तब मौत नहीं , और जब मौत होती है तब हम नहीं"




मार्लोन सामुएल बेक्कत के अनुसार


"If i was dead i would not know , i was dead . and that's the only thing against my death.I want to enjoy my death"


तो क्यों न हम हर वक्त अपनी मौत का इंतज़ार करे खुशी के साथ , जाने तब क्या होगा जब कुछ नहीं होगा


और हाँ कभी सोचा है , ज़िन्दगी से आपको मिला क्या,


कमसे कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नही ,
जिन्दगी तुने तो दिया धोके पे धोका



तो ज़िन्दगी को समझने के लिए मौत से प्यार जरुरी है। एक हिन्दी गाने के बोल याद आते है


"ज़िन्दगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी , मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जायेगी "




ये तो कुछ बाधाएं मात्र है जो हमें जीवन से प्यार करना सिखाती हैं , क्योंकि समाज जिन्दा व्यक्तिओं का समूह है । और हर समाज अपने जैसे लोगो को तवज्जो देता है , विरलों को नहीं ।


CHARLES LARA की कुछ पक्न्तियन हैं


Death is so permanent
for those who haven’t tried it

Death is too tragic
when destiny shows up early

Death is anything
and everything
like those enjoying wine

Death is a white sky
at night and everything is great
for those who want to imagine

Death is playing banjo
songs without time

Death is a monster movie come alive
for those that have not died

Death has no direction

Death dies out another cigarette

Death is always on vacation

Death rolls the dice
behind whispers of prayers

Death is slow motion

Death is better than sex

Death is good as long as it is somebody else

Death is a sweet symphony
when it ‘s right

मेरे लिए ज़िन्दगी का मतलब वही है जो शायद आपके लिए मौत का है.... क्योंकि मौत भी कही कहीं एक ज़िन्दगी की शुरुआत है


मैं नहीं कहता है आप आत्महत्या कर ले अपितु मैं सिर्फ़ कहना चाहता हूँ , मौत एक श्राप नही वरदान है, और वैसे भी मेरे कुछ भी कहने न कहने से क्या फर्क पड़ता है , क्योंकि एक न एक दिन तो हम सबने मरना है ।


जिंदगी के कई आयाम हो सकता है , कुछ पंक्तियन निम्नुसार हैं
I could go on and on and tell you all about life

But I'm not here to sort this out for you

cuz..
Life is all about you and how you treat it

You criticizes it...well, you're actually criticizing yourself

You like it, you hate it..well, its all up to you

Life is you so be careful how you describe it





लेकिन मौत का सिर्फ़ एक आयाम है " स्वयं मौत"।




so finally don't afraid of death , coz "DEATH" is also "LIFE"


ANUPAM S. Shlok
(ANUPAMISM Rocks)
9868929470, 9619499813

Saturday, December 6, 2008

IN THE SEARCH OF PERFECT WORLD...

कभी कभी लगता है मैं पागल हूँ , क्योंकि ये प्रयास ही व्यर्थ है की मैं कभी भी एक परफेक्ट वर्ल्ड पा सकूँ , एक सामान्य व्यक्ति बनकर मैं रहना नही चाहता हूँ , और महान बनना इतना आसान नहीं । फिर मेरी तलाश का अंत क्या है , शायद कुछ और प्रश्नों का जमावाडा ।

आख़िर ऐसा क्यो हो , की हम अपने संस्कारो को ताक़ पर रख देते है, समाज को ताक़ पर रख देते हैं ।
सिर्फ़ अपनी चंद इच्छाओको पुरा करने के लिए.... और शायद उन इच्छाओ की पूर्ति कुछ और नई इच्छाओ को जनम देती हैं । जो पूर्णतः निषेध होती है ।

मैं मानता हूँ , अपनी इच्छाओ को मारना असंभव है, क्योंकि हम मनुष्य हैं , एक अदद मनुष्य
हम अपनी करना चाहते है , हम ख़ुद को सर्वोपरि समझते हैं । जो शायद हम है भी, मगर फिर भी न जाने क्यो मैं समझता हूँ अपनी कामुक और मादक इच्छाओ को मारा नहीं तो रोका तो अवश्य जा सकता है।

क्यो हम लोग विवाहपूर्व संबंधो और विवाहेतर समंधो में जाने लगें हैं, क्यों हमारे संस्कार हारते जा रहे हैं, क्यों हम अपने जीवन का परमोदेश्य यौन संबंधो को मानने लगे हैं। क्यो हम परमशक्ति के कथन को भुला रहे हैं, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमे लगता हैं , हम हमेशा सही है। और हमे अपने दिल की करने का पुरा हक है ।

समाज तो हमें सिर्फ़ एक बंधन सा लगता है , जो हमें हमारी करनी से रोक देना चाहता है....., शायद किसी रुदीवादी व्यक्तिओं का समूह भर मात्र । जो शायद वो है भी ।

ये सारे नियम कानून भी ख़ुद इश्वर द्वारा निर्मित नहीं बल्कि किसी व्यकी विशेष या व्यक्ति समूह ने ही बनाये हैं। फिर हम इनका पालन क्यो करें?

उत्तर सिर्फ़ यही हो सकता है की समाज को सही ढंग से चलने के लिए इनका पालन परमावश्यक है ।

चंद लोगों की मानसिक विकृति पूरे समाज को हताहत कर रही है... जिसके लिए हम तैयार नहीं हैं ।

दिन ब दिन अपराध बाद रहे हैं... हर व्यक्ति तार्किक हो गया है , बुद्धिजीविता का परिचायक हो गया है...


ये सब देख देख के मैं पागलपन के नए सोपानों पर पहुँच रहा हूँ ।

शायद मैं रुदीवादी हूँ , जो बदलावों को नहीं देख पा रहा है, या शायद मैं दूरदर्शी हूँ जो आने वाले भविष्य
से अवगत है

जो दुनिया को आने वाले प्रलय से बचाना चाहता है । आप लोगों का साथ चाहता हूँ । और इस क्रान्ति , जो अपने संस्कारों और संस्कृति को बचाने के लिए है, को नाम देता हूँ अनुपमिस्म (Anupamism)

Regards- Anupam Sharma (9868929470)
(Anupamism Rocks)

जब तक जीवन, तब तक संघर्ष। (1-Oct-2022)

हा जीवन , तुम संघर्ष; मुझ दीन की व्यथा का व्यंग बनाते तुम , मृत्यु शैय्या पर स्वप्न दिखाते तुम , नित्य हृदय छेदन , नित्य चरित्र ह्रास, जब तक...