Wednesday, 8 January 2014

एक करुण रात्रि का वर्णन...!!!(22- February- 2002)

रोती हुई आँखों से कविता लिखने कि ठानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;
हास्य के सम्राट द्वारा श्रेस्ठ रचना आ रही ,
रात के ११ बजे , पड़ोसन हमारी गा रही है ,
दिमाग मैं है जंग सा थोडा बहुत है लग रहा ,
लग रहा है बगल में बुड्ढा अभी तक जग रहा ,
कुत्ते कि गुर्राहट से नींद अब तो जानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;


टीवी पड़ा है बंद पर सोना नहीं है आ रहा ,
भूत नयी कविता का ये मस्तिष्क से नहीं जा रहा ,
हाथ में पीड़ा सा कुछ अनुभव हमें है हो रहा ,
और प्रिय कालू हमारा ऊँचे स्वर में रो रहा ;
जितने लम्बे पैर हैं , चद्दर उतनी ही तानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है


भैंस कि झंकार से मम्मी हमारी जग पड़ी ,
पेट क्या ख़राब है , ये कहके हमसे लड़ पड़ी ,
"अनुपम" कि कलम को तोड़कर फैंका वहाँ ,
अस्थि पंजर ढूंढने में लग गए जहाँ तहाँ ;
ऐसे में पापा को मेरे दूध रोटी खानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
22-Feb- 2002


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