Friday, 3 January 2014

बिलकुल पगली है तू ...!!!!(3-Jan-2014)

ओ रही हवा, बिलकुल पगली है तू ,
यूँ बौराई फिरती है , कूचा कूचा , गली गली ;
यूँ तो भिखारी मानेगा रे तुझे हर कोई ,
हर ठौर पे रुकोगी तो थक न जाओगी ;
बावरी , जरा चुनरी संभाल , सरकने न दे ;
कुछ तो होश में रह , पगलाई बेवा सी न बन ;
देख तो पैर बचा , कही कंकर न चुभ  जाए ;
अगले मोड़ पे कीचड है , धस न जाना कही ;
कुलबुलाई जा रही है , किसे गलियाती है ??
थोडा रुकेगी तो चलूँगा मैं भी साथ में ,
सुबह से कुछ खाया भी नहीं है न तूने ?
तभी दुबलाई जा रही है दिन - ब - दिन ,
अच्छा सुन , सो ले कुछ देर छाँव है बरगद कि ,
संग तेरे मैं भी सुस्ता लूंगा कुछ देर यहीं ;
हाहाहा , क्या , डर सतावे है तुझे प्रेत का;
तुझ से बड़ा प्रेत मुझे तो न दिखा कोई ;
चल छोड़ , न छेड़ता तुझे , छोड़ दिया ;
पर याद रखियो , मुझ जैसी प्रीत न मिलेगी तुझे ,
ओ रही हवा, बिलकुल पगली है तू।



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
3-Jan-2014
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