Wednesday, 11 December 2013

बस ऐसे ही....!!!!

कुछ शब्द हैँ  जो लिखे थे किन्ही परिस्थितियों में , बस ऐसे ही , कहीं लिख डाले थे बस ऐसे ही किसी डायरी में। अब उस डायरी के वो पन्ने फटने लगें हैं , तो सोचा क्यों न लिख डालूं उन्ही पंक्तियों को बस ऐसे ही फिर से कही , ताकि  वो शब्द मर न जाएँ ....




१) मेरी धड़कन दिल में रहने का किराया माँगने लगी..
भटकती रूहें क़ब्रों में रहने को सहारा माँगने लगी..
अजीब दौर है , आज गंगा में पानी नही खून बहता है ..
मछलियाँ उछली , मछुआरों से किनारा माँगने लगी !!


२) वो मुझी से मुझी को छीनना चाहता है..
अजीब है पहले फैंकता है फिर बीनना चाहता है..
सब जानते हैं मैं हज़ार बार हारा हूँ..
नामुराद सिकंदर नस्ली है , फिर से जीतना  चाहता है!!


३) तू दौलत छीन सकता है , मेरा ख्याल नही..
मेरा जवाब बदल सकता है , मेरा सवाल नही..
अरे मैने जो लुटाया , वो कमाकर लुटाया है..
जो लूट सारा सूद था मेरा हलाल नही !!


४) बदन के हर हिस्से में कपकपी दौड़ती है..
ये नायाब रूह है , कभी पकड़ती कभी छोड़ती है..
मेरे बालों की मत सोच मेरा सर उड़ा के ले जा..
ये सर्दियों की धूप है , कभी पुचकारती है कभी खौलती है!!!


५) मैं रो  रहा था , मुझे थपकियों से चुपाया गया..
मैं मोम न था ,  फिर भी धूप से बचाया गया..
एक वो आदमी था , जो भूख से मर गया..
मुझे प्यास क्या लगी , सुर्ख खून  पिलाया गया!!


६) उस रात सपना  तो आया पर नींद नहीं आयी..
मैं बैठा रहा उसे नहीं आना था वो नहीं आयी..
हौले हौले मेरी साँसे रुकीं नब्ज़ थमी खून टपका ..
लाल लिबास में जनाज़े पे आयी , उसे शर्म नहीं आयी!!


७) मेरे ख्वाब ही काफी हैं , मुझे  कोई और सच  नहीं सुनना ..
दिले - मदिर में  रखा है तुझे , कोई और ख्वाब नहीं बुनना ..
यूँ तूने तो न बताया  मगर तेरी आँखें तो बोलती हैं..
तेरी साँसे सुन चूका हूँ , अब राग दरबारी नहीं सुनना !!


८) मैं जानता था  के मैं शीशा हूँ , टूटूंगा, फिर भी पत्थर को ललकारा ..
मैं जानता था के ये सांप है, काटेगा, फिर भी पाला पुचकारा ..
मैं जानता था के ये मोहब्बत है,मेरे बस कि बात नहीं..
समझाया दिल को पर वो नहीं माना , फिर से टूटा बेचारा !!


९) मैं सांपो की बस्ती में दूध बेचता हूँ..
मैं फूलों के बगीचों में काँटे सींचता हूँ..
आईने में शक्ल देखी है मैंने ख़ुद की..
वो मुझ पे मरती है ये ख़ुशफहमियां सहेजता हूँ!!


१०) मेरी  लाश पड़ी थी दीमक आये गुदगुदाने लगे ..
हाथ-पाँव धड़ को छुआ भी , दिलो-दिमाग़ ख़ाने लगे ..
पर उसके असर से उनपे क़यामत सी गुजरी ..
घर पहुँचे बीवीओं को छुआ भी नहीं , कवितायें सुनाने लगे!!


११) वो मेरी चाहत को अपना जो लेती ठीक था ..
वो अगर अब दूर है तो न मिली तो न सही..
मेरी कलम के साथ थी और साथ ही रहना उसे ..
जो कसीदा लिख नहीं पाया मियाँ सजदा सही !!


१२) वो मेरे कदमो पे आके गिर गयी और रो पड़ी..
 मन किया कि चूम लूँ  पर क्या करूँ वाजिब न था..
जो मैं उसको छू भी लेता चूमना तो दूर था..
लो कहते मर गया , पर अब भी आशिक़ कम नहीं !!



१३) तू कहे तो आसमां से चाँद तोड़ लाऊँ..
तू कहे तो फरिश्तों कि फ़ौज़ ले आऊँ..
बस तेरे कहने का इंतज़ार है ..
क्योंकि मुझे तेरी दौलत से बहुत प्यार है !!


१४) चूस कर मेरा लहू , फेफड़ा यूँ खा लिया..
मानो खूं लिम्का कि बोतल और बर्गर फेफड़ा !!


१५) मंज़िलो को ढूँढने में हम तुम्हारे साथ हैं ..
लेकिन कमी  एक चस्मे कि है वो दिला दो तो चलें !!


१६) आन्सू बहाने का सबब क्यों मैं  सरेआम करूँ ..
मुझे जिंदगी ने मारा है , मैं मौत को क्यों बदनाम करूँ ..
तेरा दिल है तो रह, वरना जा , मुझसे मत पूछ ..
तेरे रुकने भर के लिए मैं क्यों दीवाना नाम करूँ !!!


१७) वो भी दिन थे जब राजा थे , अब भीख मांगते हैं ..
कभी चाँदी के चम्मच से खाते थे , अब ख़ाक छानते हैं ..
हमसे दोस्ती करते तो मज़े में रहते ..
दुश्मनी की , पहले पतलून पहनते थे , अब पायज़ामा टाँगते हैं!!


१८ ) सुनहरे बाल, सुनहरी आँखें , उसके ख्याल सुनहरे ..
सुनहरे पांव , सुनहरे होंठ , उसके सवाल सुनहरे ..
सुनहरी सुनहरी से लगती थी जब आती थी सपनो में..
सुनहरी चप्पल , सुनहरे थप्पड़ , हमारे गाल सुनहरे !!!


अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com



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