Tuesday, 24 December 2013

वो मिला मुझे कल ....!!! (23- Dec-2008)

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो ज़िन्दगी का इंतज़ार कर  था ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था।

वो बैठा रहा , मैं सोचता रहा ,
क्या कोई ऐसा भी हो सकता है ?
वो खुद एक दुनिया , और दुनिया जिसका ख्वाब ,
वो जो कई कायनातों के बाद आया है।
वो जो जिंदगी का बनके ख्वाब आया है।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ।
मैं गया उसके पास, वो लम्हा था १ ख़ास।
क्योंकि मैं ज़िन्दगी से बचना चाहता था ,
और वो ज़िन्दगी को बचाना चाहता था।
उसके लिए गुरु ही ब्रह्मा , और मेरे लिए अहं ब्रह्मास्मि।
एक क्षण को देखा उसने ,और फिर नज़रें झुका ली।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो शायद चाँद सा रौशन , या हज़ार चांदो का चाँद।
वो गुलाब कि खुशबू , या खुद एक गुलाब।
वो माला का मोती , वो आफ़ताबो  मेहताब।
वो हवा का संगीत , वो भंवरे का ख्वाब।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो ज़िन्दगी का इंतज़ार कर  था ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था। 



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com 



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