Monday, 30 December 2013

कवि की आत्मा से साक्षात्कार....!!! (31-Jan-2002)

एक कवि  की आत्मा से साक्षात्कार हुआ ,
वो ढीठ बड़ी मुश्किल से इंटरव्यू हेतु तैयार हुआ ;
शुरूआत  हुई प्रश्न , उत्तर कि बरसात कि ;
अनुपम कि करतूतों और महोदय कि बात कि;
पहला प्रश्न उनकी कविता सम्बन्धी पूछा गया ,
प्रश्न सुन कवि ३ घंटे लगातार  रोता गया ;
रोने का कारण पूछने पर उत्तर कुछ इस प्रकार मिला। 
"मैं पहले वीर रस का कवि था ,
मगर वीरता कि कमी थी ,
सारी वीरता कहीं कोने में जमी थी ,
संपादक कविता सुन चपरासी को मेडिकल भिजवाते थे ,
ख़ास 5000 mg. कि डिस्प्रिन कि गोली मंगवाते थे ;
उसके बाद जाने का आदेश देते थे ,
बिना कहे ही एडवांस पकड़ा देते थे ;
मगर पत्रिका में से कविता नदारद हुआ करती थी ,
पैसे कि भरमार मगर शौहरत कि कमी हुआ करती थी ;
शौहरत के लिए सोचा क्यों न करुण रस अपनाया जाए ,
सारे देश को बाल्टियां भर भर के रुलाया जाया ;
ये सोच अपनी पहली करुण कविता अपने पुत्र को सुनायी ,
तो जनाब ने खिलखिलाकर हमारी खिल्ली उड़ाई ;
उसे बच्चा जान समझाया ,
"बेटे करुण रस कि कविता पे हँसते नहीं रोया करते हैं ,
साथ ही पिताजी कि इज़्ज़त का ख्याल रखा करते हैं ;"
जवाब मिला 
"आप छोटे से बच्चे कि भूख पर हमें रुलाना चाह रहें हैं ,
और इसे करुण रस कि कविता बता रहें हैं ,
देश कि ६०% जनता के भूखे रहने पे कोई नहीं रोया करता ,
हर बड़ा व्यक्ति उनकी दशा पे चद्दर तान के सोया करता ;
तो फिर तो ये बच्चा है , इसपर कौन रो सकता है ,
और जो रो सके क्या वो आपकी कविता पड़ सकता है "
छोटे से बच्चे ने हमारी गलती को पकड़वाया ,
साथ ही साथ करुण रस को बदलने का एहसास भी करवाया ;
तो जनाब हमने अब हास्य रस अपनाया ,
लेकिन साहब साल भर बाद सम्मलेन का नंबर आया ;
प्रथम नंबर हमारा था , सारे श्रोतागण उत्तेजित थे ,
हास्य रस के फन में अभी तो हम नवोदित थे ;
कविता से पहले मुख्य अतिथि ने अपना इंट्रोडक्शन करवाया ,
अपने आप को अंडरवर्ल्ड डॉन के नाम से पहचानवाया ;
तो साहब हमें बुलवाया गया ,
तथा मुख्य अतिथि को खुश करने को बतलाया गया ;
बेकार कविता पे दो कारतूस का इनाम था ,
इसलिए पंडित , मुल्ला , पादरी का ख़ास इंतज़ाम था ;
तो हमने कविता सुनाना शुरू किया ,
दुर्भाग्य कि प्रथम पंक्ति में ही पुलिस का नाम लिया ,
पुलिस का नाम सुनते ही मुख्य अतिथि ने इनाम दिलवाया ;
तथा हमारा मेल परमात्मा से कराया ;
तब से भूत बना फिर रहा हूँ , अगले जन्म कि प्यास में ,
यमराज के पास ही रहता हूँ , कविता सुनाने कि आस में ;
यहाँ कविता सुना सकता हूँ ,क्योंकि किसी के सिरदर्द नहीं होता,
छोटा हो या बड़ा कोई भूखा नहीं सोता ;
कोई डॉन नहीं होता मुख्यअतिथि के रूप में ;
और इनाम के रूप में गोली नहीं मिलती ;
मैं उत्तर में खोया था , कि महोदय का मोबाइल झन्नाया,
तथा उन्हें तुरंत कवि सम्मलेन में पहुँचने का आदेश आया ;
यमराज के साथ उनकी मिसेज़ आ रहीं  थीं ,
और बगल से ही सम्मलेन तक कि  बस भी  जा रही थी ;
महोदय झट से बस में सवार हो गए ,
बिना रस कि कविता सुनाने हेतु बेकरार हो गए ;
हमने भी उनसे विदा ली , अगली भेंट तक ,
तथा उनके जीवन पे विचार किया बड़ी देर तक ;
हम भी घर आ गए दूसरी बस पकड़कर ,
आंसू आ गए संपादक के इंटरव्यू पड़कर !!!



अनुपम S "श्लोक "
31-Jan-2002
anupamism@gmail.com


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