Wednesday, 11 December 2013

जिंदगी (20 /Oct/ 2009)

कल मैंने ज़िन्दगी को हँसते हुए देखा,
शायद हँसी ज्यादा खूबसूरत थी, या ख़ुद ज़िन्दगी;
दो पल उसे देखा , और फिर मैंने नज़रें झुका लीं ,
डर था कहीं उसे मेरी ही नज़र ही न लग जाए;
जिंदगी और मेरे बीच एक शीशे की दीवार;
और उस दीवार पर लगी, उज़ली नीली रौशनी;
पर उस उज़ली रौशनी से ज्यादा उजाली ख़ुद ज़िन्दगी;


जिंदगी के मुंह से निकले दो शब्द " क्या हुआ";
जिसका जवाब न मैं दे सकता था, न देना  ही था;
कई बार सवाल , जवाब से ज्यादा खूबसूरत हो जातें हैं,
कई बार सवाल , सवाल न रहकर "जिंदगी" बन जाते हैं;
जिंदगी की आँखें जैसे , दूध से भरी झील,
और उस झील के बीचों बीच बैठा एक कला हंस ,
पर उस झील की गहराई से ज्यादा गहरी ख़ुद जिंदगी;


पर आज जिंदगी के माथे पर एक सिलवट दिखाई दी,
वो सिलवट जो मेरी जिंदगी लेने के लिए काफ़ी थी,
काश मैं ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका बन पाता,
हर सिलवट, हर गम, उड़ा के ले जाता,
पर अभी मेरे शब्द रुक रुक से जाते हैं,डरते हैं;
माना वो इंसान हो सारी कायनात के लिए,
पर सारी कायनात हो एक इंसान के लिए,
मैं अवाक , निशब्द,पर मुझसे ज्यादा निशब्द ख़ुद जिंदगी ।



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
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