Tuesday, 3 December 2013

कर्म- सार (11- May -2003)


रात के अंधेरे से उज़ाले की ओर...
मयूरी का नृत्य, मृदंगो का शोर...
चलायमान थे पद मेरे ...
कभी तीव्र कभी हो जाते थे धीरे..
बस शून्य को पाना चाहते थे..
ईश्वरीय प्रेम-सुधा को गाना चाहते थे..
माया के अंतः द्वंद को त्यागकर..
दुष्प्रवृत्तियों रूपी देह को मारकर..
मंद-मंद जलद की बूंदे..
थी जलमग्न राह की कूंजे..
सांध्यगीत की बेला उत्तम..
अंतःमन की राह पर हरदम..
नश्वर जगत को त्यागकर फिर से..
ईश्वर प्राप्ति जानी थी घर से..
प्रार्थना को त्यागकर अधिकार हेतु..
आज पार करना था दीर्घ सेतु..
मैं था द्रढ़-निश्चय से निकला ..
जाना स्वयं को अब तक पगला..
सहसा सामने मंदिर आया..
मूर्ति रूप में कृष्ण को पाया ..
उनके जीवन पर विचार से एक अंश को प्राप्त किया..
मानव रूपी देह से ही जीवन को समाप्त किया..
ना वैराग्य ना था कुछ छोड़ा..
अर्थ ,घर ,हाथी और घोड़ा ..
क्या वो समझना चाहते थे ??
कर्म- सार लाना चाहते थे..
धर्म अर्थ को तुम जानो ..
सत्या , दया , दान को मानो..
वैराग्य धारण नही है धर्म..
सर्वोपरि मनुष्य का कर्म ...
ईश्वर को पाना चाहते  हो ...
पूर्ण करो कर्तव्य तुम अपने..
यह निश्चित है, कर्मकांड से ..
पूर्ण होंगे सुंदर सपने ...
वापिस लौट चला था घर को ..
मार सका था पूर्व तेवर को 
तब से ही ये बतलता हूँ ...
कर्म सार को मैं गाता हूँ ..
"निश्चित ही है , ईश्वर प्राप्ति ...
जब होगी जीवन समाप्ति...


अनुपम S. "श्लोक "
www.anupamism.blogspot.com

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