Saturday, 28 December 2013

सपनो के जजीरे का पंछी......!!! (28/Dec/2013)

अनदेखे सपनो के जज़ीरों पे एक पंछी आ बैठा,
जाना सा , पहचाना सा , सफेद पंखो वाला।
जजीरे के चारों तरफ पानियों कि भरमार ,
वो पगला सा , चोंच से नमकीन पानी चुनता।
उसी जजीरे के एक कोने पे छोटा सा घर था मेरा ,
याद तो होगा न , सपनो का सौदागर था मैं.
उस दिन उड़ते उड़ते आया ,बिना बताये  दबे पांव,
मेरे आँगन में दबी  कुछ , चने कि दाल चुराने।
उसे लगा कि मुझे पता नहीं कुछ ,
देख तो लिया था  मैंने उसे , पर  बोला नहीं कुछ।
मुझे ऐसा लगा कोई सिद्ध ब्राह्मण आया है , भोज करने।
आखिरकार मैंने आवाज़ लगायी कर्कश सी कि ," कौन है वहाँ"?
उसे डराने के लिए नहीं , लजाने के लिए ;
उसने उड़ना  तो बहुत चाहा होगा ,पंछी ही था आखिर ,
पर मेरी आवाज़ कि सच्चाई ने नहीं उड़ने दिया उसे।
मैंने भीतर से कुछ और दाल लाकर देदी उसे,
दोस्त बन गए हैम दोनों , पक्के दोस्त ;
रोज़ आता था वो , और कुछ मीठा सा गाना सुना जाया करता था।
 तब तक चला ये , जिस दिन तक मुझे राजा के महल न जाना पड़ा।
जब वापिस आया मैं , नहीं पाया उसे कभी भी मेरे घर में ,
 महीनो बीते , याद आती थी मुझे उसकी कभी कभार ;
एक दिन उसका एक पंख मिला मुझे,
मेरी घर के पिछवाड़े जहाँ  पालतू बिल्ली रहती थी मेरी।


अनुपम S "श्लोक"
28/Dec/2013
anupamism@gmail.com

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