Wednesday, 11 December 2013

कंक्रीट.....!! (2009)

कंक्रीट ,बस यही शब्द काफ़ी है,
मेरी ज़िन्दगी की इमारत, कुछ ईंट ,गारे ,रेट पर खड़ी है,
ओर मै ख़ुद पलस्तर पर पानी डाल डाल कर थक चुका हूँ;
मेरी उम्मीद इस छत का ढूला सा है,
मेरी इन्सानिअत फर्श पर लकीर सी चिपकी है ,
पर मै, अभी भी जिंदा हूँ....साँस लेता हूँ,
क्योंकि ये कंक्रीट .....मुझे जिंदा चाहती है,




राजमिस्त्री मुझे ११ फीट बनाना चाहता था,
और मैं ...मैं बुलंदी चाहता था।
मजदूर मुझे तीन हाथ खोदना चाहता था ॥
और मैं...मैं पाताल तक खुदना चाहता था।
समय ने मुझे सीमेंट की सिल्ली सा पकड़ लिया था ,
ऊँची सीदी ने आधी दूरी पर मुझे पकड़ लिया था,
मैं बजरी सा खुदरा था , हूँ ,रहूँगा।
और ये कंक्रीट मुझे सपाट रखना चाहती है।


ये इमारत बस गिरने वाली है ,
हर दीवार बदसूरत है, खोखली है,खाली है।
हलकी- हलकी सी थकान ,सीलन सी लगती है,
मेरी आँखों से एक भभकन सी निकलती है,
मेरी बगल वाली ईमारत छोटी थी ,ऊँची कैसे हो गई,
मेरे मकान पर लगी नेमप्लेट किस धुएँ में खो गई ;
ये सीदियाँ, क्या बस भटकाना जानती हैं,
और कंक्रीट .....
कंक्रीट ,तो ख़ुद कंक्रीट में घुलकर कंक्रीट बन 


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8447757188

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