Monday, February 10, 2014

बदलते एहसास ......!!!!





मेरे घरों के तालो का कुछ चोर बेनागा हिसाब रखते हैं ..
ये कलयुगी बगुले हैं , हंस मारके मोती निगलने की चाह रखते हैं ...
कुछ छिछोरे व्यंग उपदेश लगते थे हमको गीता का..
कटघरों में खड़ी हैं राधाएँ आज, सब कृष्ण दोधारी नक़ाब रखते हैं...!!(27- Nov-2013)


क्या लिख डालूं की तुझे महसूस हो दर्द-ए-उलफत करीने से..
हर हर्फ का असर यूँ हो की खून निकले तेरे भी सीने से..
आके देखे मेरे बसेरे पे बसेरा आज बाजो-चीलो का है...
रोशनी खफा है मेरे आँगन से , सिर्फ़ अंधेरा झाँकता है जीने से.!!(20-Nov-2013)

बहुत देखे थे तुझ जैसे बदन को नोचने वाले...
बहुत देखे थे तुझ जैसे बदन गोरे पर दिल काले...
तेरी आयद को सबसे जुदा , था मेहरे- खुदा माना ..
फफोले पड़ गये है अब लबों पे , दिल पड़े छाले..!!!(15-Nov-2013)


फन उठाते सान्पो को आस्तीनो में छुपाया मैने..!!
अंधेरो के माथो पे , सुर्ख सिंदूर लगाया मैने...!!
मरते मरते भी , गंगाजल नही शराब माँगी..!!
बड़ी तरकीबों से तेरा नाम भुलाया मैने...!!(11-Nov-2013)


पेशानी के पसीने को पानी समझ लिया...
मेरे चुप रहने को मेरी नादानी समझ लिया...
राहे उल्फ़त का जनाज़ा ज़रूर उठा था उस रात...
जब उदुन के बाशिन्दो को मैने "ज्ञानी" समझ लिया...!!(9-Nov-2013)


रोशनी के गर्म थपेड़े , आँख बंद कर लेने से थमे हैं कहीं???
कुछ पन्ने फाड़ लेने से जिंदगी की किताब बदली है कहीं??
कुछ नही बदलता...कुछ भी नही... सिवाय.....
रिश्ते..कुछ टीस के साथ ही सही..रिश्ते बदल ही जाते हैं....!!(29- August-2013)


ये जो उनी स्वेटर सी उलझी गमगीन तनहाईयाँ थी वीरान अंधेरों में दुबकी दुबकी..!!
इनसे कह दो की सरगोशियाँ मिली हैं हमें, इश्के-गरमाइयाँ मिली हैं हमें...!!(1-July-2013)


मैं बिक रहा हूँ टुकड़ा टुकड़ा होकर...
खरीददार मिले तो, बिना मोल बिक जाऊं..
बेखौफ समंदर तो हूँ मैं अविरल , अनंत...
तू इशारा कर तेरी पलकों में छिप जाऊं...!!!(3-May-2013)


देखो तो मेरे मकान की छत का एक कोना गायब है दोस्त...
शायद कल तूफान ज़ोरों से बहुत आया है...
अरे गायब तो वो मनी प्लांट की बेल और वो तुलसी का पौधा भी है ,
जो तब लगाया था जिस दिन देखा था उसे पहली बार..!!!(6 -Nov-2013)

उसके हिस्से से मेरी बदसलूकियाँ छीन कर , मैने उसे किसी और के नाम लिख दिया ....!!!!(25-March-2014)

जो जिंदगी होता है , उसको ढूंढने  में जिंदगी लग जाती है  कई बार !!!(3-Apr-2014)



Anupam S "Shlok"
anupamism@gmail.com
8447757188

बारीक कहानियाँ...!!!(4-July-2013)


छोटाईयाँ.....!!!!(17- Jul-2013)


आवारगी....!!! (27-Oct-2013)


बटेर...!!!!(28-Oct-2013)


अंडे वाले बिस्कट....!!!( 9-Feb-2014)


Thursday, January 9, 2014

जय महाकवि अनुपम शर्मा ....!!!(25-August-2002)



इस व्यस्त दुनिया  में रहने वाले हम भी हैं ,
नाम है अनुपम शर्मा ;
मुझसे ही प्रेरणा लेकर अपने बच्चो को ,
कवि बनाना चाहती है  हर माँ ;
वैसे तो और भी कवि इस संसार में बसते हैं ,
पर  वो तुच्छ "महाकवि" के समक्ष कहाँ टिकते हैं ;
मुझ जैसा हरफनमौला कहाँ मिल सकता सकता है जग को ,
मेरा स्थान वही है , जो मिला है अंगूठी में नग को। 
पर आज प्रसिद्धि का कारण आपको बताने का मन करता है ;
हालंकि अंतः मन बताने से डरता है ,
पर सुनिये यूंकि ये हम बोल रहें हैं ,
बोलने से पहले शब्दो को चुन चुनके तोल रहें हैं ;


मैं भी पहले नमूना सा कवि था , हालत ठीक न थे ,
कविजगत में अन्य कवि झूमर से सजे थे ;
मगर किस्मत का भी क्या ठिकाना है मिस्टर ,
बेहोश पड़े थे , खड़े होगये तनकर ;
कारण था हमें C.M. कि source मिल गयी थी ,
असल में उनकी कविता कि आदत नयी नयी थी ;
मगर अन्य कवि उनकी महाकविता सुनने से कतराते थे ,
सुनने जाते थे पदों पर , स्ट्रेचर से वापिस आते थे ;
उनकी कविता बेसिर - पैर कि हुआ करती थी ,
मगर कविता में खोट निकलने कि आदत , कवियों के प्राण हरती थी ,
मगर मेरा इरादा पक्का था , आगे बढ़ने का ,
C.M. का सहारा लेकर , कविता जगत रूपी पेड़ पर चढ़ने का ,
अतः प्रयासों से हम उनके चमचे बन गए ,
पहले बदबूदार मोज़े थे , अब गमछे बन गए ;
C.M. आवास में जाने कि छूट मिल गयी हमें ,
हम भी दिनभर रहते थे वही जमें ,
अब तो हम C.M. के प्यारे हो गए थे ;
प्रतिभा प्रदर्शन से जग में न्यारे हो गए थे ,
१ माह में ४ संकलन छप चुके थे ,
पुरस्कार लेने हेतु सूट नप चुके थे ;
तब से ही जलते हैं हमसे सभी कवि ,
मानो सितारों को मिटाने आया हो कोई रवि ,
हमारी कविता सुन बच्चे जल्दी सो जाते हैं ,
और पागल तक (ही) हमारी कविता सुनने आते हैं ;

तो , आज तुम्हे सफलता हेतु एक सूत्र देता हूँ ,
आप कि नैया को अब में खेता हूँ ,
तो बोलो एक वादा दे पाओगे ,
यदि कुछ बनना चाहते हो तो चमचे बनके दिखलाओगे ,
फल के रूप में फिर दूध मलाई खाओगे ,
फिर एक वादा कर लो तुम " मुझे नहीं भूल जाओगे" 
जय माता के साथ ही तुम , जय अनुपम शर्मा गाओगे "



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
8447757188
25-August-2002

कवि सम्मलेन का वर्णन.....!!!( 1-May-2002)


करुण कविता के पश्चात हास्य का नंबर आया ,
तो अध्यक्ष के सेक्रेटरी ने अध्यक्ष को हमारा नाम सुझाया ;
जनता के आँखों से मोती रुपी अश्रु  गिर रहे थे ,
सहायक जन अध्यक्ष के बगल में रूमाल लेके खड़े थे ;
ऐसे में हास्य कविता ऊंट के मुंह में जीरा प्रतीत होती ;
हमारी कविता सुनकर जनता दीदे फाड़ के रोटी ,
फिर भी हमने आदेश माना , सुनाने लगे कविता ,
कविता कुछ इस प्रकार की थी ;


जूते के बग़ल में पड़े थे मौज़े हमारे ,
सूंघते ही बेहोश हो गए "सारे के सारे" ;
हमारा सौभाग्य कि पालतू पूसी ले गयी मुंह में दबाके ;
मानो बिल्ली चली हो हज़ को ८० चूहे खाके ;
बदबू का कारण बदतमीज़ी पूसी कि थी ;
पेट ख़राब होने पर भी मौज़ों के ऊपर बैठी थी ;
होश आने पर लोगों का गुस्सा हमारे पर था ;
बोले जहाँ बैठे थे वो शौचालय  नहीं घर था ;
उन्हें क्या पता ये पूसी का  काम है,
कवि जगत में "अनुपम" का कितना बड़ा नाम है ;
बात को ६ वर्ष हो गए मगर "सारे" घर नहीं आये ,
नयी कविता के भी उन्होंने "रसगुल्ले" नहीं खाये ;
पूसी को भगा दिया हमने जूते मार के ,
बंद करा दिए "गैप" अपने द्वार के ,
बस यही मौज़ों और पूसी कि कहानी है ,
और ये कहानी "अनुपम शर्मा" की जुबानी है। 


हमारी इस तुच्छ कविता ने रुलाई बंद करायी ,
माईबाप जनता ने वन्स मोर कि आवाज़ लगायी ,
तो इस बार हमने "क्रिकेट मैच " का वर्णन किया ,
मैच कुछ इस प्रकार का था ,

"भारत और पाकिस्तान का मैच था "अनुपम"
शाहिद , सचिन बेकरार थे दिखाने को अपनी सरगम ,
टॉस का समय था , कप्तान सामने खड़े थे ,
वेन्यू टोरंटो था , दोनों के रुख कड़े थे ;
टॉस उछाला गया , सौरभ ने टॉस जीता ;
बगल में खड़ा था , वक़ार नामक चीता ;
सौरभ के जीतते ही , वक़ार ने गुर्राहट लगायी ,
"टॉस फिक्सिंग " है , ये कहके बात बढ़ायी ;
बड़ी मुश्किल से वक़ार को मनाया गया ,
टॉस हारने पर भी उसी से मंगाया गया ,
तो वक़ार ने पहले बल्लेबाज़ी मांगी ,
श्रीनाथ कि प्रथम गेंद ही शाहिद ने हवा में टांगी ,
कैच करने वाला सचिन तेंदुलकर था ,
मगर अंपायर पाकिस्तानी जावेद अख्तर था ,
तो अंपायर ने बॉल को नो बॉल बताया ,
और नो बॉल पे कैच करने के लिए ५ रन का पेनल्टी लगाया ,
२५ ओवर के बाद पाकिस्तान के १११ रन थे ,
दोनों ओपनर  अब तक विकेट पे डटे थे;
अब  बॉलिंग द्रविड़ को दी गयी , उसने कमाल कर दिया ;
पहली ३ गेंदो पर हैट्रिक लेकर धोती को फाड़ के रुमाल कर दिया ;
पाकिस्तानी टैलेंडर  ने कुछ साहस दिखाया ,
तथा स्कोर २७० / ९ तक पहुँचाया ;


पारी भारत की थी २७१ रन बंनाने थे ,
इस बार अंपायर  वेंकटराघवन कुछ जाने पहचाने थे ;
भारत कि तरफ से ओपनर वेंकटेश ने शतक बनाया ,
मगर उसका साथ टैलेंडर सचिन को  छोड़ कोई न दे पाया ;
अंतिम ओवर था ५ रन बनाने थे ,
इस बार जावेद अख्तर के ज़माने थे ;
बॉलर था सोहेब , बैट्समैन था सचिन ;
प्रथम गेंद पर ही रन लिए तीन ,
ओपनर वेंकटेश प्रसाद स्ट्राईक पर आया ,
और उसने आसानी से १ रन चुराया ,
४ गेंद बाकी थी १ रन बनाना था ,
विकेट भी एक था , समर्थको का तराना था ,
अगली गेंद को सचिन ने पुश किया ,
मगर अंपायर ने सचिन को आउट दे दिया ;
आउट होने का काऱण कुछ न बता पाने पर ,
अंपायर ने आउट को नोट आउट कराया ,
ऊँगली उठ जाने को एक छोटी से गलती बताया ;
अगली गेंद सचिन के ऑफ-स्टंप के बाहर पैड पर टकरायी ,
बिना अपील के अंपायर ने फिर से ऊँगली उठायी ;
इस बार अंपायर ने सचिन को एलबीडबल्यू कराया ;
बेईमानी से ही सही किन्तु मैच टाई कराया ;

इस कविता को सुन एक क्रिकेट समर्थक ने हमें ५०० रु पकड़ाये ,
तथा अनुपम शर्मा इस कवि- सम्मलेन में बेस्ट कवि आये ;



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
8447757188
1-May-2002






Wednesday, January 8, 2014

एक करुण रात्रि का वर्णन...!!!(22- February- 2002)

रोती हुई आँखों से कविता लिखने कि ठानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;
हास्य के सम्राट द्वारा श्रेस्ठ रचना आ रही ,
रात के ११ बजे , पड़ोसन हमारी गा रही है ,
दिमाग मैं है जंग सा थोडा बहुत है लग रहा ,
लग रहा है बगल में बुड्ढा अभी तक जग रहा ,
कुत्ते कि गुर्राहट से नींद अब तो जानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;


टीवी पड़ा है बंद पर सोना नहीं है आ रहा ,
भूत नयी कविता का ये मस्तिष्क से नहीं जा रहा ,
हाथ में पीड़ा सा कुछ अनुभव हमें है हो रहा ,
और प्रिय कालू हमारा ऊँचे स्वर में रो रहा ;
जितने लम्बे पैर हैं , चद्दर उतनी ही तानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है


भैंस कि झंकार से मम्मी हमारी जग पड़ी ,
पेट क्या ख़राब है , ये कहके हमसे लड़ पड़ी ,
"अनुपम" कि कलम को तोड़कर फैंका वहाँ ,
अस्थि पंजर ढूंढने में लग गए जहाँ तहाँ ;
ऐसे में पापा को मेरे दूध रोटी खानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
22-Feb- 2002


परीक्षा का भूत.....!!! (6 - Apr- 2002)

वह मनुष्य था या यमराज का दूत ,
स्पष्ट नहीं होता ,  यदि चढ़ा हो परीक्षा का भूत ;
पूर्ण दिवा - रात्रि सोचने में चली जाती है ,
स्वप्न में मात्र कबीर कि जीवनी याद आती है ;
गणित के सूत्र रटना आसान नहीं होता ;
परीक्षा हेतु नक़ल ले जाने वाला शैतान नहीं होता ;
हर माता अपने  पुत्र को समझती है सपूत ,
स्पष्ट नहीं होता ,  यदि चढ़ा हो परीक्षा का भूत ;


इंग्लिश कि स्पेलिंग राइटिंग रांग  हो जाती है ,
लिखना चाहता था ईश्वर (GOD ) मगर कुत्ते (DOG) का एहसास दिलाती है ,
संस्कृत के रूपों में अहं घूमता रह जाता हूँ ,
लट् कि जगह लोठ् , और लोठ् कि जगह लृट् के रूप लिखके आता हूँ ;
फिजिक्स , केमिस्ट्री , बायो में कन्फ्यूजन हो जाता है ,
E = mc2 डार्विन का सिद्धांत नज़र आता है ,
सामाजिक विज्ञान कि तूती केवल घर में बोलती है ;
नंबर नदारद होते  हैं , असल दिखता है केवल सूद ,
स्पष्ट नहीं होता ,  यदि चढ़ा हो परीक्षा का भूत। 


अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
6-April-2002



Saturday, January 4, 2014

इस रात के बाद ....!!!(4th - Jan - 2014)

मिल जाएगा बहाना  तुम्हे इस रात के बाद ,
नया ठौरे ठिकाना तुम्हे इस रात के बाद। 

अटखेलियों कि  रिमझिम बौछारें  थमेंगी अब तो ,
बंजर रहेगी  धड़कन  इस रात के बाद। 

छायी हुयी ये धुंध ,मुट्ठी में जो थी मेरी;
दम मेरा घोट देगी इस रात के बाद। 

जो दोस्त थी हमारी वो बदनसीब गलियां ,
अजनबी सी होंगी इस रात के बाद।  

आंसुओं से शायद , समंदर को भर मैं डालूं ,
ये आग कब बुझेगी इस रात के बाद ;

रोओगी तुम भी हरपल ये बद्दुआ है  मेरी ,
तड़पोगी , खुश न होगी इस रात के बाद। 

सिंदूर ही था बाकी , बीवी तुम्हे था माना ,
बेवा बनी फिरोगी इस रात के बाद। 

छोड़ो "श्लोक" हम भी कातिल कम नहीं हैं ,
पछताएँ शायद हम भी इस रात के बाद। 



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
4th- Jan-2014

Friday, January 3, 2014

कवितायेँ जन्म नहीं लेती....!!!! (3rd-Jan-2014)

कवितायेँ जन्म नहीं लेती ,
पर कविता ने कल रात जन्म लिया।
एक अट्टहास के साथ , कोलाहल के साथ ,
पुऱाने संतरे के पेड़ के नीचे ,
किसी नौसिखिये कवि  कि कलम से।
जिसकी तलाश ही थी , कविता का जन्म।
देखो तो मुस्कुराती हंसी उसके चेहरे पे ,
जैसे कुछ नया चुटकुला सुना हो कोई ;
अब देखना...
देखना कविता का बालक से युवती बनने का सफ़र ,
और फिर कविता बूढ़ी हो जायेगी ,
पर वो मरेगी नहीं , क्योंकि कवितायें मरती नहीं कभी ;
शब्दो के शुक्राणु और भावनाओं के अंडाणु ,
दोनों ही तो अमर हैं , तो कविता क्यों मरेंगी भला ?
ये सहवास ही तो पवित्र है बस ;
जो केवल कविता के जन्म के लिए ही है  ;
किसी भौतिक आनंद के लिये नहीं।
आओ गीत गायें , प्रफुल्लित हों ,
क्योंकि कविता ने जन्म लिया है ,
जबकि कविताएं जन्म नहीं लेती।



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
3rd-Jan-2014

बिलकुल पगली है तू ...!!!!(3-Jan-2014)

ओ रही हवा, बिलकुल पगली है तू ,
यूँ बौराई फिरती है , कूचा कूचा , गली गली ;
यूँ तो भिखारी मानेगा रे तुझे हर कोई ,
हर ठौर पे रुकोगी तो थक न जाओगी ;
बावरी , जरा चुनरी संभाल , सरकने न दे ;
कुछ तो होश में रह , पगलाई बेवा सी न बन ;
देख तो पैर बचा , कही कंकर न चुभ  जाए ;
अगले मोड़ पे कीचड है , धस न जाना कही ;
कुलबुलाई जा रही है , किसे गलियाती है ??
थोडा रुकेगी तो चलूँगा मैं भी साथ में ,
सुबह से कुछ खाया भी नहीं है न तूने ?
तभी दुबलाई जा रही है दिन - ब - दिन ,
अच्छा सुन , सो ले कुछ देर छाँव है बरगद कि ,
संग तेरे मैं भी सुस्ता लूंगा कुछ देर यहीं ;
हाहाहा , क्या , डर सतावे है तुझे प्रेत का;
तुझ से बड़ा प्रेत मुझे तो न दिखा कोई ;
चल छोड़ , न छेड़ता तुझे , छोड़ दिया ;
पर याद रखियो , मुझ जैसी प्रीत न मिलेगी तुझे ,
ओ रही हवा, बिलकुल पगली है तू।



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
3-Jan-2014

आओ आंसू , थमो नहीं.... !!!!(3-Jan-2014)

आओ आंसू , थमो  नहीं.... !!!!
धो दो ये दाग कि मैं उसका पहला प्यार नहीं ,
या प्यार ही नहीं शायद…??
धो डालो वो वक़्त कि जब मैं उसके संग था ,
धो डालो वो स्पर्श जो महसूस होता था उसकी छुअन पे ;
पर जानता हूँ , तुम एक छिछोरी पानी कि बूँद हो बस ;
कलुषित कलंक को धो न पाओगे।
तुम तो तब भी निकले थे , जब मैं बार बार बिखरा  था ,
क्या प्राप्त किया मैंने या तुमने अब तक।
ये आज का युग है , कलयुग है ;
जब भी तुम आते थे , समझाता था तुम्हे चुपके से ,
ये प्रेम नहीं है माया है , मकड़ी का जाला  सा ;
हाँ दोषी मैं हूँ , पर तुम भी हो , मानोगे न ?
जब मेरी आँख से निकले तुम कोई मूल्य न था ,
उसकी आँख से निकले मैंने तुम्हे ईश्वर माना ;
याद है न , ऊँगली पे लेके पिया था तुम्हे , जैसे गंगाजल ;
तुमने शिकायत भी नहीं कि उसकी तब भी , कि ढोंग है सब ;
चलो छोड़ो , अब जाने दो , उसको जीना है जीने दो ;
जब भी चाहो आ जाना , मेरी आँखों पे छा  जाना ;
प्रण है तुम्हे न रोकूंगा , घर दूंगा , दूंगा सम्मान ;
आओ चले मित्र बन जाएँ , संग रहे सदा ,
आओ आंसू , थमो नहीं …!!!!



अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
3rd - January 2014

Tuesday, December 31, 2013

जान की क़ीमत...!!!!(8/Oct/2002)

वह खड़ा था फिर,
देख रहा था टुकुर टुकुर ;
मगर कुछ समझ न आया ,
न समझ सकता ही था ;
बस,बस में देखना था ,
सो देखे जा रहा था ;
मेरे से पूछा  हिचकिचाकर ;
क्या है तथा क्यों है ;
जवाब न था मेरे पास ,
मिलके तीसरे से पूछा ,
उसका हाल था हमारे जैसा ;
एकत्र ७ लोग  हो चुके थे ,
कोई कुछ नहीं जानता था ;
२० मिनट बीते , मौका आगे जाने का मिला ,
देखा "१ सितारे " ने एक भिखारी को कुचल डाला था ;
वो कहता था मुझसे गिड़गिड़ाकर ,
"बाबूजी २ रुपये दे दो , बच्चे भूखे हैं ";
पता चला "सितारा" १९ लाख देगा ,
जान की कीमत १९ लाख ????
अच्छा है , अब बच्चो का पेट भर जाएगा।


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8-Oct-2002


Monday, December 30, 2013

कवि की आत्मा से साक्षात्कार....!!! (31-Jan-2002)

एक कवि  की आत्मा से साक्षात्कार हुआ ,
वो ढीठ बड़ी मुश्किल से इंटरव्यू हेतु तैयार हुआ ;
शुरूआत  हुई प्रश्न , उत्तर कि बरसात कि ;
अनुपम कि करतूतों और महोदय कि बात कि;
पहला प्रश्न उनकी कविता सम्बन्धी पूछा गया ,
प्रश्न सुन कवि ३ घंटे लगातार  रोता गया ;
रोने का कारण पूछने पर उत्तर कुछ इस प्रकार मिला। 
"मैं पहले वीर रस का कवि था ,
मगर वीरता कि कमी थी ,
सारी वीरता कहीं कोने में जमी थी ,
संपादक कविता सुन चपरासी को मेडिकल भिजवाते थे ,
ख़ास 5000 mg. कि डिस्प्रिन कि गोली मंगवाते थे ;
उसके बाद जाने का आदेश देते थे ,
बिना कहे ही एडवांस पकड़ा देते थे ;
मगर पत्रिका में से कविता नदारद हुआ करती थी ,
पैसे कि भरमार मगर शौहरत कि कमी हुआ करती थी ;
शौहरत के लिए सोचा क्यों न करुण रस अपनाया जाए ,
सारे देश को बाल्टियां भर भर के रुलाया जाया ;
ये सोच अपनी पहली करुण कविता अपने पुत्र को सुनायी ,
तो जनाब ने खिलखिलाकर हमारी खिल्ली उड़ाई ;
उसे बच्चा जान समझाया ,
"बेटे करुण रस कि कविता पे हँसते नहीं रोया करते हैं ,
साथ ही पिताजी कि इज़्ज़त का ख्याल रखा करते हैं ;"
जवाब मिला 
"आप छोटे से बच्चे कि भूख पर हमें रुलाना चाह रहें हैं ,
और इसे करुण रस कि कविता बता रहें हैं ,
देश कि ६०% जनता के भूखे रहने पे कोई नहीं रोया करता ,
हर बड़ा व्यक्ति उनकी दशा पे चद्दर तान के सोया करता ;
तो फिर तो ये बच्चा है , इसपर कौन रो सकता है ,
और जो रो सके क्या वो आपकी कविता पड़ सकता है "
छोटे से बच्चे ने हमारी गलती को पकड़वाया ,
साथ ही साथ करुण रस को बदलने का एहसास भी करवाया ;
तो जनाब हमने अब हास्य रस अपनाया ,
लेकिन साहब साल भर बाद सम्मलेन का नंबर आया ;
प्रथम नंबर हमारा था , सारे श्रोतागण उत्तेजित थे ,
हास्य रस के फन में अभी तो हम नवोदित थे ;
कविता से पहले मुख्य अतिथि ने अपना इंट्रोडक्शन करवाया ,
अपने आप को अंडरवर्ल्ड डॉन के नाम से पहचानवाया ;
तो साहब हमें बुलवाया गया ,
तथा मुख्य अतिथि को खुश करने को बतलाया गया ;
बेकार कविता पे दो कारतूस का इनाम था ,
इसलिए पंडित , मुल्ला , पादरी का ख़ास इंतज़ाम था ;
तो हमने कविता सुनाना शुरू किया ,
दुर्भाग्य कि प्रथम पंक्ति में ही पुलिस का नाम लिया ,
पुलिस का नाम सुनते ही मुख्य अतिथि ने इनाम दिलवाया ;
तथा हमारा मेल परमात्मा से कराया ;
तब से भूत बना फिर रहा हूँ , अगले जन्म कि प्यास में ,
यमराज के पास ही रहता हूँ , कविता सुनाने कि आस में ;
यहाँ कविता सुना सकता हूँ ,क्योंकि किसी के सिरदर्द नहीं होता,
छोटा हो या बड़ा कोई भूखा नहीं सोता ;
कोई डॉन नहीं होता मुख्यअतिथि के रूप में ;
और इनाम के रूप में गोली नहीं मिलती ;
मैं उत्तर में खोया था , कि महोदय का मोबाइल झन्नाया,
तथा उन्हें तुरंत कवि सम्मलेन में पहुँचने का आदेश आया ;
यमराज के साथ उनकी मिसेज़ आ रहीं  थीं ,
और बगल से ही सम्मलेन तक कि  बस भी  जा रही थी ;
महोदय झट से बस में सवार हो गए ,
बिना रस कि कविता सुनाने हेतु बेकरार हो गए ;
हमने भी उनसे विदा ली , अगली भेंट तक ,
तथा उनके जीवन पे विचार किया बड़ी देर तक ;
हम भी घर आ गए दूसरी बस पकड़कर ,
आंसू आ गए संपादक के इंटरव्यू पड़कर !!!



अनुपम S "श्लोक "
31-Jan-2002
anupamism@gmail.com


Saturday, December 28, 2013

अजी खुश हूँ बहुत....!!!( 28/Dec/2013)

सपनो के जजीरे का पंछी......!!! (28/Dec/2013)

अनदेखे सपनो के जज़ीरों पे एक पंछी आ बैठा,
जाना सा , पहचाना सा , सफेद पंखो वाला।
जजीरे के चारों तरफ पानियों कि भरमार ,
वो पगला सा , चोंच से नमकीन पानी चुनता।
उसी जजीरे के एक कोने पे छोटा सा घर था मेरा ,
याद तो होगा न , सपनो का सौदागर था मैं.
उस दिन उड़ते उड़ते आया ,बिना बताये  दबे पांव,
मेरे आँगन में दबी  कुछ , चने कि दाल चुराने।
उसे लगा कि मुझे पता नहीं कुछ ,
देख तो लिया था  मैंने उसे , पर  बोला नहीं कुछ।
मुझे ऐसा लगा कोई सिद्ध ब्राह्मण आया है , भोज करने।
आखिरकार मैंने आवाज़ लगायी कर्कश सी कि ," कौन है वहाँ"?
उसे डराने के लिए नहीं , लजाने के लिए ;
उसने उड़ना  तो बहुत चाहा होगा ,पंछी ही था आखिर ,
पर मेरी आवाज़ कि सच्चाई ने नहीं उड़ने दिया उसे।
मैंने भीतर से कुछ और दाल लाकर देदी उसे,
दोस्त बन गए हैम दोनों , पक्के दोस्त ;
रोज़ आता था वो , और कुछ मीठा सा गाना सुना जाया करता था।
 तब तक चला ये , जिस दिन तक मुझे राजा के महल न जाना पड़ा।
जब वापिस आया मैं , नहीं पाया उसे कभी भी मेरे घर में ,
 महीनो बीते , याद आती थी मुझे उसकी कभी कभार ;
एक दिन उसका एक पंख मिला मुझे,
मेरी घर के पिछवाड़े जहाँ  पालतू बिल्ली रहती थी मेरी।


अनुपम S "श्लोक"
28/Dec/2013
anupamism@gmail.com

Tuesday, December 24, 2013

आखिर किसने ???? ( 8/Apr/2008)

किसने  तुम्हे हक़ दिया मेरी  ज़िन्दगी से खेलने का ?
क्या हक़ है तुम्हे इतना खूबसूरत लगने का ?
क्यों मैं बार बार तुम्ही  को याद करता हूँ , तुम्ही को सोचता हूँ ?
क्यों मेरी आखें सिर्फ तुम्ही को देखना चाहती हैं ?
क्यों मेरे लब केवल तुम्हारा ही नाम लेना चाहते हैं ?
क्यों आखिर क्यों मैं ऐसा  हो गया हूँ ?


शायद कुछ चीज़ें मेरे रुबरु ही नहीं होना चाहतीं,
पर तुम एक चीज़ तो नहीं ,
तुम एक एहसास हो जिंदगी भर के लिए ,
एक एहसास जो तन बदन और साँसों तक में बस चुका है।
जब भी तुम्हे मेरे प्राणों कि आवश्यकता पड़े ,
आना और नि:संकोच मांग लेना।


अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com




याद ....!!! (6/Apr/2008)

तुम मुझसे  दूर हो सकते हो , मेरी यादों से नहीं।

क्योंकि जब जब मेरी साँसे चलेंगी,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब मेरी आँखें कुछ देखेंगी,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब सागर में पानी बहेगा ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब ये धरती घूमेगी ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब घड़ी कि सुई हिलेगी ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब पेड़ो के पत्ते हिलेंगे,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब पक्षी चहचाहेंगे ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
और हाँ जब जब तुम मुझे याद नहीं करोगी।,
तब तब मैं तुम्हे याद करूँगा।

अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com

कुछ ही पल...!!!(26-March-2008)



कैसे बदल जाती है ज़िन्दगी , सिर्फ कुछ  ही पलों में।
जो अपना हो , बेगाना हो जाता है। 
जो नया था , वो पुराना कहलाता है। 
क्यों साथ ,जुदाई बन जाता  है। 
क्यों दिन रात में डूब जाता है। 
क्यों प्यार एक किस्सा बन के रह जाता है। 
क्यों जो करीब था वो , दूर हो जाता है। 
कैसे पत्थर देवता हो जाता है। 
क्यों मेरी साँसे मेरा दम घोटने लगती है। 
क्यों मेरी परछाई मुझसे दूर भागना चाहती  है। 
क्यों मेरी नींद मुझसे आँख चुराती है। 
क्यों मेरी आँखें अब सपने नहीं दिखाती हैं,

समझना चाहता हूँ मगर समझ नहीं आता है ,
क्या क्या हुआ और क्या क्या हो जाता है। 

सिर्फ कुछ ही पलों मैं.… 
सिर्फ कुछ ही पलों मैं.… 
सिर्फ कुछ ही पलों मैं.… 


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com 

मैं आज फिर तनहा हूँ...!! (27-Aug-2008)

मैं आज फिर तनहा हूँ...!!
क्या यही माँगा था मैंने ज़िन्दगी से ?
मैंने तो बस आराम चाहा था , तन्हाई नहीं।
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??

उन आँखों में घंटो देखता था।,
मेरी ज़िन्दगी केवल ढाई इंच आँखें थी।
लेकिन उन आँखों ने क्या माँगा होगा ?
मेरा साथ ही माँगा होगा शायद।
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??

वो रातें , दोस्तों के साथ बीतती थी ,
वो बातें , गम ख़ुशी बांटती थी। 
वो शामें घूमने को होती थी। 
क्या वो मुझसे  दूर जा सकते थे ?? नहीं। 
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??

जिंदगी बदल गयी है , मैं बदल गया हूँ। 
राहें बदल गयीं हैं मैं बदल गया हूँ। 
सोच बदल गयी है , मैं बदल गया हूँ 
विश्वास बदल गए हैं , मैं बदल गया हूँ। 
और सच सिर्फ ये कि …… 
मैं आज फिर तनहा हूँ...!!


अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com



वो मिला मुझे कल ....!!! (23- Dec-2008)

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो ज़िन्दगी का इंतज़ार कर  था ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था।

वो बैठा रहा , मैं सोचता रहा ,
क्या कोई ऐसा भी हो सकता है ?
वो खुद एक दुनिया , और दुनिया जिसका ख्वाब ,
वो जो कई कायनातों के बाद आया है।
वो जो जिंदगी का बनके ख्वाब आया है।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ।
मैं गया उसके पास, वो लम्हा था १ ख़ास।
क्योंकि मैं ज़िन्दगी से बचना चाहता था ,
और वो ज़िन्दगी को बचाना चाहता था।
उसके लिए गुरु ही ब्रह्मा , और मेरे लिए अहं ब्रह्मास्मि।
एक क्षण को देखा उसने ,और फिर नज़रें झुका ली।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो शायद चाँद सा रौशन , या हज़ार चांदो का चाँद।
वो गुलाब कि खुशबू , या खुद एक गुलाब।
वो माला का मोती , वो आफ़ताबो  मेहताब।
वो हवा का संगीत , वो भंवरे का ख्वाब।

वो मिला मुझे कल फिर से ,  कुछ सोचता हुआ ,
वो ज़िन्दगी का इंतज़ार कर  था ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था। 



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com 



Wednesday, December 18, 2013

कहाँ गया पाप ??? (29 - 10 - 2004)

मेरा नाम अनुपम है तो सोचा न, क्यों न नामनुसार कुछ अनुपम कार्य किया जाए ,
कुछ  ख़ास तो करने को है नहीं  ख़ाली समय में  कुछ खोज  कि जाए. 
तो यही सोच ,  सोचने लगा कोई प्रश्न , जो अनुत्तरित हो असोचा हो ;
सोचता रहा आखिर क्या अनुत्तरित है अब तक जग में ?

७२ घंटो के बाद दो  प्रश्न सामने थे?
प्रथम , आखिर मानव मृत्य पश्चात कहाँ जाता है ?
ईश्वर को प्राप्त करता है , या मिट्टी  में मिल जाता है ?
दूसरा , आखिर सदियों से करोडो मानवो ने गंगा में अपने पाप धोये ,
लेकिन सारा पाप गया कहाँ??

प्रथम उत्तर प्राप्त करने हेतु मरना जरुरी था ,
अतः दूसरे को प्रथम मानकर जा पहुंचा हरिद्वार।

कुछ भैंसे किनारे पर नहा रही थीं ,
कुछ स्त्रियाँ दीपक बहा रही थीं। 
कुछ "फ़ूल" जो तैर रहे थे ,
और कुछ "फूल" जो डूब जाने थे।  
ऐसा था कुछ गंगा का हाल। 

ऐसी स्थिति को अनदेखा कर पुकारा… 
" हे गंगे प्रकट हो !!"
आश्चर्य ! प्रथम पुकार में ही गंगा समक्ष थी.
मैंने कुछ क्षण अपलक देखा फिर पूछा।  

"हे गंगे मैं कोई पुण्यात्मा नहीं ,फिर इतनी शीघ्र  क्यों  दर्शन दिए  ?"
उत्तर मिला " पुत्र हज़ारों वर्ष बीत  गए, कोई  कहता है ,
धन दो , कोई कहता है संतान दो;
पर कोई भी प्रकट होने को नहीं कहता ,
तुमने कहा तो मैं खुद को रोक नहीं पायी। "
"बोलो तुम्हारा  स्वार्थ क्या है "?

मैं बोला "माता मैं दुविधा में स्वयं को पाता हूँ,
अथक प्रयासों बाद भी एक उत्तर नहीं पाता हूँ

आखिर तुमसे ही पूछने चला आया हूँ , कृपया उत्तर दो।

बताओ "सदियां बीती ,  बीते युग भी , बीते कल्प हज़ार ,
किन्तु रहा ये प्रश्न अनुत्तरित ,  अनुपम सदाबहार  .

"पापी भीष्म था, पापी भीम भी ,
पापी दुर्योधन और कर्ण ,
पापी कुंती  और द्रौपदी ,
पापी कहीं कृष्ण का प्रण ,
पापी साधु , मुनि , ऋषि ,
और पापी राजा प्रत्येक ;
पापी लालू, पापी सोनिया ;
अडवाणी अटल समेत ;
पापी मैं और तुम भी हो,
फिर कौन रहा है बाकी ,
किन्तु एक बात समझ न आती ;
तुझमें जो नहा गया ,
वो पा गया पापों से मुक्ति,
चाहे हो कोई ईश पुजारी ,
या न जाने वो भक्ति ,
फिर भी आते हैं , नहाते हैं ,
और अपना पाप छोड़ जाते हैं ,
तो बताओ…

जब लाखों नहा गए , तो पाप समतुल्य ही होगा
खरबो न हो , अरबों में ही , टनों पाप तो होगा ;
किन्तु आज भी लोग आते हैं ,
नहाते हैं , और पाप छोड़ जाते हैं ;
तो बताओ , इतना पाप गया कहाँ ??"

गंगे हंसी और बोली ,
"बेटा प्रश्न तेरा महान है ,
पर मैं असमर्थ बताने में,
लोग लगे थे नहाने में
और मैं आगे सरकाने में ;

अर्थात "मैं एक ओर से पाप लेती हूँ ,
और दूसरी और से समुद्र को दे देती हूँ ;
अतः ये प्रश्न समुद्र से पूछो कि ,कहाँ गया वो पाप ?
वही संचित स्थल का नाम बता पायेगा ,
और साथ ही मुझे भी सूचित करवाएगा ;

तो  मैं पहुंचा सिंधु समीप , लेकर प्रश्न विकराल ,
दी आवाज़ प्रकट हो सागर , तू वृहद् , दीर्घ , विशाल                                        
शीघ्र समक्ष सागर को पाकर , प्रश्न शीघ्र ही पूछा
सुना प्रश्न को , सोच विचारा , किया शीश को नीचा ;

वो बोला , " शर्मसार हूँ मैं , उत्तर मुझको भी न आता ,
जो पाप गंगे से मिलता , मैं भी आगे सरकाता ,
मैं तो जल के साथ पाप भी सूरज को पकड़ाता  हूँ ,
वाष्पीकृत रूप में ही , मैं पाप आगे ले जाता हूँ ;
अतः प्रश्न सूरज से पूछो , कहाँ गया वो पाप `
और  यदि उत्तर पाते हो , परम पूज्य हो आप ;


ले विदा  पुकारा सूरज को , वो प्रकट हुआ अतिशीघ्र,
बोला क्या चिंता औ इच्छा , हे मानव श्रेष्ठ अतिवीर !
मैं बोला , अनुपम हूँ मैं , और सूर्यदेव हो आप ;
कृपया उत्तर दो हे देव , कहाँ गया वो पाप;
कहाँ गया वो पाप , जो गंगा ने थोक मे पाया ;
फिर समुन्द्र ने पाकर उससे , तुम्हें अधिपति बनाया ;


बोला सूर्य " जो दिया सिंधु ने , पाप  कलंकित काला ,
वो समस्त पाप मैंने बादल को दे डाला।
उससे ही पूछो कि कहाँ गया वो पाप ,
और कृपया उत्तर पाकर  सूचित करना आप।

तो अब लक्ष्य था , बादल का घर , पहुंचा फिर उससे पूछा ,
तुम श्रेष्ठ  दानी बादल हो , धरती को तुमने सींचा ;
किन्तु चाहूं  एक प्रश्न पूछना , उत्तर देना आप ,
जो सूरज ने तुम्हें दिया था , कहाँ गया वो पाप;

हो गम्भीर , बादल बोला , "हे अनुपम , लाओ कान ",
धन्य हो तुम कि पूछा तुमने ,ये प्रश्न है अति महान।
जो पाप सूर्य से मिलता है , उसे पानी में मिलवाता हूँ ,
उस जल मिश्रित पाप को मैं धरती वापिस भिजवाता हूँ।
जिसका जितना होता है, उसको वापिस कर देता हूँ ,
और नए पाप का ढेर सूर्यदेव से लेता हूँ।

मानव गंगा में देता है , सिंधु गंगे से पाता है,
फिर सूर्य उस पाप को ले चक्र आगे बढ़ाता है। 
मैं सूरज से लेकर उसको वर्षा जल में मिलवाता हूँ। 
जिसका जितना होता है उसको वापिस करता जाता हूँ।  

उत्तर पाकर मैं लौट चला, जो पाना था वो पाया ,
सूचित करके देवजनों को मानव को भी  बतलाया ;
किन्तु मानव है "श्रेष्ठ", अतः उसने कहा न माना ;
इस आपबीती घटना को उसने कविता मात्र ही माना।

अब भी लोग जीते हैं , पाप करते हैं , और हरिद्वार जाते हैं ,
और ये सोच गंगा में नहाते हैं ,
कि गंगा में नहाने से सारे पाप धुल जाते हैं 




अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com

असर ...!!! (30 - July - 2006)

गीत भी लिखा तो ग़ज़ल  बन गयी.… 
ये तेरी "याद" का असर था। 
हंसना चाहा तो आंसू  बरस पड़े.… 
ये तेरी "आह" का असर था। 
छुआ जो किसी और को उँगलियाँ तड़प उठी.…
ये तेरी "चाह" का असर था। 
चले थे इबादत को पहुंचे तेरे मकान को.…
ये तेरी "राह" का असर था। 
"दिल" धड़कना चाहता था , पर "दिल"नहीं .… 
ये तेरे "असर" का "असर" था। 

अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com

कॉल लैटर ...!!! (13-August-2003)

कागजों के ढेर के ऊपर पड़ा एक कॉल लैटर भी था ;
युवक के सामने , उसकी आँखों के  लक्ष्य पर ;
मेडिकल कॉलेज के लैटर हेड पे ,
उसके प्रवेश को प्रतीक्षरत ;
विद्यालय स्तर तक सर्वश्रेस्ठ था , किन्तु शायद अब नहीं ;
क्योंकि अब जरुरत "अर्थ" कि थी ,
१२ लाख में प्रवेश बिक रहे थे ,उससे मांग १० लाख कि थी।
उसने एक पल सोचा …
कितने मिलेंगे इस मकान के??
शायद ४ लाख में बिकेगा ....  और बाकी ६ लाख ??
और नज़दीक ही बहन  कि शादी है।
इसी उधेरबुन में एक विचार फिर कौंधा ,
क्यों न लोन ले ले.…
कम ब्याज पे शिक्षा लोन।
१ माह भागदौड़ के बाद, १० लाख का चेक हाथ में लेकर
चेहरे पर ख़ुशी के साथ , वापिस घर पहुंचा।
आश्चर्य  लड़के वाले प्रत्यक्ष थे।
लोन कि खबर उन्होंने भी सुनी थी।
और अब विवाह से १० दिन पूर्व
दहेज़ के लिए ८ लाख मांगे थे।
उनको विदा कर फिर उधेड़बुन में डूब गया वो।
अब क्या करे… दाखिला ले या दहेज़ दे दे।
बहन को देगा तो लोन कैसे वापिस करेगा ??
इसे चिंता में उसे नींद ने आ घेरा।
अगली सुबह तैयार होकर वो कहीं जा रहा था।
दबे पांव भारी मन से.… न जाने कहाँ को अग्रसारित था।
अरे !!! ये तो लड़के वालों कि गली है।
और कॉल लैटर ?????
अरे वो तो डस्टबीन में पड़ा है।



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com

सवाल - 2...!!!!!(2- Dec-2013)




सवाल .....!!!! (23 - May-2013)


तुम न... तुम ना कसम से मेरी जान ले लोगे !!(9th-August-2013)


ओफ्फो .....!!! (July 2013)


आह....(19-11-2013)


दीपक बनाम अँधेरा ...!!! (16-01-2004)




रात  की तरह अँधियारा फैला है.. 
मन  में और बाहर ;
और आज चाँद भी नहीं निकला;
रात डरावनी है.... मैं डरपोक नहीं 
डरूंगा तो जियूँगा कैसे ?
मुझे तो दीपक जलाना  है.. 
अंधियारे के बीच... उजाले के लिए ;
लेकिन , लेकिन मुझे दीपक कौन दिखायेगा??
क्या कोई दूसरा "अनुपम "??
और उसे ??
ओह , प्रश्न गम्भीर है ,  उत्तर जटिल;
आहा !! उत्तर पा  लिया, इतनी शीघ्र ;
मन उत्तर जानता था दिमाग नहीं;
मैं स्वयं का मार्गदर्शन करूँगा ;
स्वयं दीपक बनूँगा ;
अब , मैं प्रतिनिधि बन पाउँगा , उजियारे का ;
अन्धकार मिटेगा निश्चित ;
ओह, लेकिन मेरी कौन सुनेगा??
मेरी  बतायी राह पर कौन चलेगा ??
आज सब समझदार हैं,
सब जानते हैं , दो कानों का सर्वोत्तम प्रयोग ;
वो अँधेरे में भी जी सकते हैं ,
उन्हें  उजाले कि क्या आवश्यकता ?
वाह!! अब उजाला सिर्फ मेरा है 
किसी को नहीं दिखाऊंगा ;
लेकिन , लेकिन  उजाला छुपता नहीं ;
क्या करूँ?? क्या करूँ ??
आहा !! दिमाग से उत्तर पाया ;
तुम्हे बताऊँ , " मैं दीपक बुझा दूंगा " 
हा हा हा हा हा 
न रहेगा बाँस , न बजेगी बाँसुरी ;
किसी को उजाला नहीं चाहिए ;
क्या तुम्हे चाहिए ????



अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8447757188


जब तक जीवन, तब तक संघर्ष। (1-Oct-2022)

हा जीवन , तुम संघर्ष; मुझ दीन की व्यथा का व्यंग बनाते तुम , मृत्यु शैय्या पर स्वप्न दिखाते तुम , नित्य हृदय छेदन , नित्य चरित्र ह्रास, जब तक...