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Saturday, July 26, 2014
Friday, July 25, 2014
Tuesday, July 22, 2014
Monday, July 21, 2014
Wednesday, July 16, 2014
Thursday, July 3, 2014
Friday, June 27, 2014
Wednesday, June 18, 2014
Monday, June 16, 2014
Tuesday, June 10, 2014
Friday, May 9, 2014
Friday, May 2, 2014
Monday, April 28, 2014
Monday, February 10, 2014
बदलते एहसास ......!!!!
मेरे घरों के तालो का कुछ चोर बेनागा हिसाब रखते हैं ..
ये कलयुगी बगुले हैं , हंस मारके मोती निगलने की चाह रखते हैं ...
कुछ छिछोरे व्यंग उपदेश लगते थे हमको गीता का..
कटघरों में खड़ी हैं राधाएँ आज, सब कृष्ण दोधारी नक़ाब रखते हैं...!!(27- Nov-2013)
क्या लिख डालूं की तुझे महसूस हो दर्द-ए-उलफत करीने से..
हर हर्फ का असर यूँ हो की खून निकले तेरे भी सीने से..
आके देखे मेरे बसेरे पे बसेरा आज बाजो-चीलो का है...
रोशनी खफा है मेरे आँगन से , सिर्फ़ अंधेरा झाँकता है जीने से.!!(20-Nov-2013)
बहुत देखे थे तुझ जैसे बदन को नोचने वाले...
बहुत देखे थे तुझ जैसे बदन गोरे पर दिल काले...
तेरी आयद को सबसे जुदा , था मेहरे- खुदा माना ..
फफोले पड़ गये है अब लबों पे , दिल पड़े छाले..!!!(15-Nov-2013)
फन उठाते सान्पो को आस्तीनो में छुपाया मैने..!!
अंधेरो के माथो पे , सुर्ख सिंदूर लगाया मैने...!!
मरते मरते भी , गंगाजल नही शराब माँगी..!!
बड़ी तरकीबों से तेरा नाम भुलाया मैने...!!(11-Nov-2013)
पेशानी के पसीने को पानी समझ लिया...
मेरे चुप रहने को मेरी नादानी समझ लिया...
राहे उल्फ़त का जनाज़ा ज़रूर उठा था उस रात...
जब उदुन के बाशिन्दो को मैने "ज्ञानी" समझ लिया...!!(9-Nov-2013)
रोशनी के गर्म थपेड़े , आँख बंद कर लेने से थमे हैं कहीं???
कुछ पन्ने फाड़ लेने से जिंदगी की किताब बदली है कहीं??
कुछ नही बदलता...कुछ भी नही... सिवाय.....
रिश्ते..कुछ टीस के साथ ही सही..रिश्ते बदल ही जाते हैं....!!(29- August-2013)
ये जो उनी स्वेटर सी उलझी गमगीन तनहाईयाँ थी वीरान अंधेरों में दुबकी दुबकी..!!
इनसे कह दो की सरगोशियाँ मिली हैं हमें, इश्के-गरमाइयाँ मिली हैं हमें...!!(1-July-2013)
मैं बिक रहा हूँ टुकड़ा टुकड़ा होकर...
खरीददार मिले तो, बिना मोल बिक जाऊं..
बेखौफ समंदर तो हूँ मैं अविरल , अनंत...
तू इशारा कर तेरी पलकों में छिप जाऊं...!!!(3-May-2013)
देखो तो मेरे मकान की छत का एक कोना गायब है दोस्त...
शायद कल तूफान ज़ोरों से बहुत आया है...
अरे गायब तो वो मनी प्लांट की बेल और वो तुलसी का पौधा भी है ,
जो तब लगाया था जिस दिन देखा था उसे पहली बार..!!!(6 -Nov-2013)
उसके हिस्से से मेरी बदसलूकियाँ छीन कर , मैने उसे किसी और के नाम लिख दिया ....!!!!(25-March-2014)
जो जिंदगी होता है , उसको ढूंढने में जिंदगी लग जाती है कई बार !!!(3-Apr-2014)
Anupam S "Shlok"
anupamism@gmail.com
8447757188
Saturday, January 18, 2014
Saturday, January 11, 2014
Thursday, January 9, 2014
जय महाकवि अनुपम शर्मा ....!!!(25-August-2002)
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कवि सम्मलेन का वर्णन.....!!!( 1-May-2002)
करुण कविता के पश्चात हास्य का नंबर आया ,
Wednesday, January 8, 2014
एक करुण रात्रि का वर्णन...!!!(22- February- 2002)
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;
हास्य के सम्राट द्वारा श्रेस्ठ रचना आ रही ,
रात के ११ बजे , पड़ोसन हमारी गा रही है ,
दिमाग मैं है जंग सा थोडा बहुत है लग रहा ,
लग रहा है बगल में बुड्ढा अभी तक जग रहा ,
कुत्ते कि गुर्राहट से नींद अब तो जानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;
टीवी पड़ा है बंद पर सोना नहीं है आ रहा ,
भूत नयी कविता का ये मस्तिष्क से नहीं जा रहा ,
हाथ में पीड़ा सा कुछ अनुभव हमें है हो रहा ,
और प्रिय कालू हमारा ऊँचे स्वर में रो रहा ;
जितने लम्बे पैर हैं , चद्दर उतनी ही तानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है
भैंस कि झंकार से मम्मी हमारी जग पड़ी ,
पेट क्या ख़राब है , ये कहके हमसे लड़ पड़ी ,
"अनुपम" कि कलम को तोड़कर फैंका वहाँ ,
अस्थि पंजर ढूंढने में लग गए जहाँ तहाँ ;
ऐसे में पापा को मेरे दूध रोटी खानी है ,
मगर कविता करुण होगी सोचना बेमानी है ;
अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
22-Feb- 2002
परीक्षा का भूत.....!!! (6 - Apr- 2002)
Saturday, January 4, 2014
इस रात के बाद ....!!!(4th - Jan - 2014)
Friday, January 3, 2014
कवितायेँ जन्म नहीं लेती....!!!! (3rd-Jan-2014)
पर कविता ने कल रात जन्म लिया।
एक अट्टहास के साथ , कोलाहल के साथ ,
पुऱाने संतरे के पेड़ के नीचे ,
किसी नौसिखिये कवि कि कलम से।
जिसकी तलाश ही थी , कविता का जन्म।
देखो तो मुस्कुराती हंसी उसके चेहरे पे ,
जैसे कुछ नया चुटकुला सुना हो कोई ;
अब देखना...
देखना कविता का बालक से युवती बनने का सफ़र ,
और फिर कविता बूढ़ी हो जायेगी ,
पर वो मरेगी नहीं , क्योंकि कवितायें मरती नहीं कभी ;
शब्दो के शुक्राणु और भावनाओं के अंडाणु ,
दोनों ही तो अमर हैं , तो कविता क्यों मरेंगी भला ?
ये सहवास ही तो पवित्र है बस ;
जो केवल कविता के जन्म के लिए ही है ;
किसी भौतिक आनंद के लिये नहीं।
आओ गीत गायें , प्रफुल्लित हों ,
क्योंकि कविता ने जन्म लिया है ,
जबकि कविताएं जन्म नहीं लेती।
अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
3rd-Jan-2014
बिलकुल पगली है तू ...!!!!(3-Jan-2014)
आओ आंसू , थमो नहीं.... !!!!(3-Jan-2014)
धो दो ये दाग कि मैं उसका पहला प्यार नहीं ,
या प्यार ही नहीं शायद…??
धो डालो वो वक़्त कि जब मैं उसके संग था ,
धो डालो वो स्पर्श जो महसूस होता था उसकी छुअन पे ;
पर जानता हूँ , तुम एक छिछोरी पानी कि बूँद हो बस ;
कलुषित कलंक को धो न पाओगे।
तुम तो तब भी निकले थे , जब मैं बार बार बिखरा था ,
क्या प्राप्त किया मैंने या तुमने अब तक।
ये आज का युग है , कलयुग है ;
जब भी तुम आते थे , समझाता था तुम्हे चुपके से ,
ये प्रेम नहीं है माया है , मकड़ी का जाला सा ;
हाँ दोषी मैं हूँ , पर तुम भी हो , मानोगे न ?
जब मेरी आँख से निकले तुम कोई मूल्य न था ,
उसकी आँख से निकले मैंने तुम्हे ईश्वर माना ;
याद है न , ऊँगली पे लेके पिया था तुम्हे , जैसे गंगाजल ;
तुमने शिकायत भी नहीं कि उसकी तब भी , कि ढोंग है सब ;
चलो छोड़ो , अब जाने दो , उसको जीना है जीने दो ;
जब भी चाहो आ जाना , मेरी आँखों पे छा जाना ;
प्रण है तुम्हे न रोकूंगा , घर दूंगा , दूंगा सम्मान ;
आओ चले मित्र बन जाएँ , संग रहे सदा ,
आओ आंसू , थमो नहीं …!!!!
अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
3rd - January 2014
Tuesday, December 31, 2013
जान की क़ीमत...!!!!(8/Oct/2002)
देख रहा था टुकुर टुकुर ;
मगर कुछ समझ न आया ,
न समझ सकता ही था ;
बस,बस में देखना था ,
सो देखे जा रहा था ;
मेरे से पूछा हिचकिचाकर ;
क्या है तथा क्यों है ;
जवाब न था मेरे पास ,
मिलके तीसरे से पूछा ,
उसका हाल था हमारे जैसा ;
एकत्र ७ लोग हो चुके थे ,
कोई कुछ नहीं जानता था ;
२० मिनट बीते , मौका आगे जाने का मिला ,
देखा "१ सितारे " ने एक भिखारी को कुचल डाला था ;
वो कहता था मुझसे गिड़गिड़ाकर ,
"बाबूजी २ रुपये दे दो , बच्चे भूखे हैं ";
पता चला "सितारा" १९ लाख देगा ,
जान की कीमत १९ लाख ????
अच्छा है , अब बच्चो का पेट भर जाएगा।
अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
8-Oct-2002
Monday, December 30, 2013
कवि की आत्मा से साक्षात्कार....!!! (31-Jan-2002)
Saturday, December 28, 2013
सपनो के जजीरे का पंछी......!!! (28/Dec/2013)
जाना सा , पहचाना सा , सफेद पंखो वाला।
जजीरे के चारों तरफ पानियों कि भरमार ,
वो पगला सा , चोंच से नमकीन पानी चुनता।
उसी जजीरे के एक कोने पे छोटा सा घर था मेरा ,
याद तो होगा न , सपनो का सौदागर था मैं.
उस दिन उड़ते उड़ते आया ,बिना बताये दबे पांव,
मेरे आँगन में दबी कुछ , चने कि दाल चुराने।
उसे लगा कि मुझे पता नहीं कुछ ,
देख तो लिया था मैंने उसे , पर बोला नहीं कुछ।
मुझे ऐसा लगा कोई सिद्ध ब्राह्मण आया है , भोज करने।
आखिरकार मैंने आवाज़ लगायी कर्कश सी कि ," कौन है वहाँ"?
उसे डराने के लिए नहीं , लजाने के लिए ;
उसने उड़ना तो बहुत चाहा होगा ,पंछी ही था आखिर ,
पर मेरी आवाज़ कि सच्चाई ने नहीं उड़ने दिया उसे।
मैंने भीतर से कुछ और दाल लाकर देदी उसे,
दोस्त बन गए हैम दोनों , पक्के दोस्त ;
रोज़ आता था वो , और कुछ मीठा सा गाना सुना जाया करता था।
तब तक चला ये , जिस दिन तक मुझे राजा के महल न जाना पड़ा।
जब वापिस आया मैं , नहीं पाया उसे कभी भी मेरे घर में ,
महीनो बीते , याद आती थी मुझे उसकी कभी कभार ;
एक दिन उसका एक पंख मिला मुझे,
मेरी घर के पिछवाड़े जहाँ पालतू बिल्ली रहती थी मेरी।
अनुपम S "श्लोक"
28/Dec/2013
anupamism@gmail.com
Tuesday, December 24, 2013
आखिर किसने ???? ( 8/Apr/2008)
क्या हक़ है तुम्हे इतना खूबसूरत लगने का ?
क्यों मैं बार बार तुम्ही को याद करता हूँ , तुम्ही को सोचता हूँ ?
क्यों मेरी आखें सिर्फ तुम्ही को देखना चाहती हैं ?
क्यों मेरे लब केवल तुम्हारा ही नाम लेना चाहते हैं ?
क्यों आखिर क्यों मैं ऐसा हो गया हूँ ?
शायद कुछ चीज़ें मेरे रुबरु ही नहीं होना चाहतीं,
पर तुम एक चीज़ तो नहीं ,
तुम एक एहसास हो जिंदगी भर के लिए ,
एक एहसास जो तन बदन और साँसों तक में बस चुका है।
जब भी तुम्हे मेरे प्राणों कि आवश्यकता पड़े ,
आना और नि:संकोच मांग लेना।
अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com
याद ....!!! (6/Apr/2008)
क्योंकि जब जब मेरी साँसे चलेंगी,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब मेरी आँखें कुछ देखेंगी,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब सागर में पानी बहेगा ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब ये धरती घूमेगी ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब घड़ी कि सुई हिलेगी ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब पेड़ो के पत्ते हिलेंगे,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
जब जब पक्षी चहचाहेंगे ,
तब तब तुम्हे याद करूँगा।
और हाँ जब जब तुम मुझे याद नहीं करोगी।,
तब तब मैं तुम्हे याद करूँगा।
अनुपम S "श्लोक "
anupamism@gmail.com
कुछ ही पल...!!!(26-March-2008)
कैसे बदल जाती है ज़िन्दगी , सिर्फ कुछ ही पलों में।
मैं आज फिर तनहा हूँ...!! (27-Aug-2008)
क्या यही माँगा था मैंने ज़िन्दगी से ?
मैंने तो बस आराम चाहा था , तन्हाई नहीं।
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??
उन आँखों में घंटो देखता था।,
मेरी ज़िन्दगी केवल ढाई इंच आँखें थी।
लेकिन उन आँखों ने क्या माँगा होगा ?
मेरा साथ ही माँगा होगा शायद।
फिर क्यों मैं आज फिर तनहा हूँ ??
वो मिला मुझे कल ....!!! (23- Dec-2008)
वो ज़िन्दगी का इंतज़ार कर था ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था।
वो बैठा रहा , मैं सोचता रहा ,
क्या कोई ऐसा भी हो सकता है ?
वो खुद एक दुनिया , और दुनिया जिसका ख्वाब ,
वो जो कई कायनातों के बाद आया है।
वो जो जिंदगी का बनके ख्वाब आया है।
वो मिला मुझे कल फिर से , कुछ सोचता हुआ।
मैं गया उसके पास, वो लम्हा था १ ख़ास।
क्योंकि मैं ज़िन्दगी से बचना चाहता था ,
और वो ज़िन्दगी को बचाना चाहता था।
उसके लिए गुरु ही ब्रह्मा , और मेरे लिए अहं ब्रह्मास्मि।
एक क्षण को देखा उसने ,और फिर नज़रें झुका ली।
वो मिला मुझे कल फिर से , कुछ सोचता हुआ ,
वो शायद चाँद सा रौशन , या हज़ार चांदो का चाँद।
वो गुलाब कि खुशबू , या खुद एक गुलाब।
वो माला का मोती , वो आफ़ताबो मेहताब।
वो हवा का संगीत , वो भंवरे का ख्वाब।
वो मिला मुझे कल फिर से , कुछ सोचता हुआ ,
और मेरा इंतज़ार ही ज़िन्दगी था।
Wednesday, December 18, 2013
कहाँ गया पाप ??? (29 - 10 - 2004)
उत्तर मिला " पुत्र हज़ारों वर्ष बीत गए, कोई कहता है ,
धन दो , कोई कहता है संतान दो;
पर कोई भी प्रकट होने को नहीं कहता ,
तुमने कहा तो मैं खुद को रोक नहीं पायी। "
"बोलो तुम्हारा स्वार्थ क्या है "?
मैं बोला "माता मैं दुविधा में स्वयं को पाता हूँ,
अथक प्रयासों बाद भी एक उत्तर नहीं पाता हूँ
आखिर तुमसे ही पूछने चला आया हूँ , कृपया उत्तर दो।
बताओ "सदियां बीती , बीते युग भी , बीते कल्प हज़ार ,
किन्तु रहा ये प्रश्न अनुत्तरित , अनुपम सदाबहार .
"पापी भीष्म था, पापी भीम भी ,
पापी दुर्योधन और कर्ण ,
पापी कुंती और द्रौपदी ,
पापी कहीं कृष्ण का प्रण ,
पापी साधु , मुनि , ऋषि ,
और पापी राजा प्रत्येक ;
पापी लालू, पापी सोनिया ;
अडवाणी अटल समेत ;
पापी मैं और तुम भी हो,
फिर कौन रहा है बाकी ,
किन्तु एक बात समझ न आती ;
तुझमें जो नहा गया ,
वो पा गया पापों से मुक्ति,
चाहे हो कोई ईश पुजारी ,
या न जाने वो भक्ति ,
फिर भी आते हैं , नहाते हैं ,
और अपना पाप छोड़ जाते हैं ,
तो बताओ…
जब लाखों नहा गए , तो पाप समतुल्य ही होगा
खरबो न हो , अरबों में ही , टनों पाप तो होगा ;
किन्तु आज भी लोग आते हैं ,
नहाते हैं , और पाप छोड़ जाते हैं ;
तो बताओ , इतना पाप गया कहाँ ??"
गंगे हंसी और बोली ,
"बेटा प्रश्न तेरा महान है ,
पर मैं असमर्थ बताने में,
लोग लगे थे नहाने में
और मैं आगे सरकाने में ;
अर्थात "मैं एक ओर से पाप लेती हूँ ,
और दूसरी और से समुद्र को दे देती हूँ ;
अतः ये प्रश्न समुद्र से पूछो कि ,कहाँ गया वो पाप ?
वही संचित स्थल का नाम बता पायेगा ,
और साथ ही मुझे भी सूचित करवाएगा ;
तो मैं पहुंचा सिंधु समीप , लेकर प्रश्न विकराल ,
दी आवाज़ प्रकट हो सागर , तू वृहद् , दीर्घ , विशाल
शीघ्र समक्ष सागर को पाकर , प्रश्न शीघ्र ही पूछा
सुना प्रश्न को , सोच विचारा , किया शीश को नीचा ;
वो बोला , " शर्मसार हूँ मैं , उत्तर मुझको भी न आता ,
जो पाप गंगे से मिलता , मैं भी आगे सरकाता ,
मैं तो जल के साथ पाप भी सूरज को पकड़ाता हूँ ,
वाष्पीकृत रूप में ही , मैं पाप आगे ले जाता हूँ ;
अतः प्रश्न सूरज से पूछो , कहाँ गया वो पाप `
और यदि उत्तर पाते हो , परम पूज्य हो आप ;
ले विदा पुकारा सूरज को , वो प्रकट हुआ अतिशीघ्र,
बोला क्या चिंता औ इच्छा , हे मानव श्रेष्ठ अतिवीर !
मैं बोला , अनुपम हूँ मैं , और सूर्यदेव हो आप ;
कृपया उत्तर दो हे देव , कहाँ गया वो पाप;
कहाँ गया वो पाप , जो गंगा ने थोक मे पाया ;
फिर समुन्द्र ने पाकर उससे , तुम्हें अधिपति बनाया ;
बोला सूर्य " जो दिया सिंधु ने , पाप कलंकित काला ,
वो समस्त पाप मैंने बादल को दे डाला।
उससे ही पूछो कि कहाँ गया वो पाप ,
और कृपया उत्तर पाकर सूचित करना आप।
तो अब लक्ष्य था , बादल का घर , पहुंचा फिर उससे पूछा ,
तुम श्रेष्ठ दानी बादल हो , धरती को तुमने सींचा ;
किन्तु चाहूं एक प्रश्न पूछना , उत्तर देना आप ,
जो सूरज ने तुम्हें दिया था , कहाँ गया वो पाप;
हो गम्भीर , बादल बोला , "हे अनुपम , लाओ कान ",
धन्य हो तुम कि पूछा तुमने ,ये प्रश्न है अति महान।
जो पाप सूर्य से मिलता है , उसे पानी में मिलवाता हूँ ,
उस जल मिश्रित पाप को मैं धरती वापिस भिजवाता हूँ।
जिसका जितना होता है, उसको वापिस कर देता हूँ ,
और नए पाप का ढेर सूर्यदेव से लेता हूँ।
मानव गंगा में देता है , सिंधु गंगे से पाता है,
फिर सूर्य उस पाप को ले चक्र आगे बढ़ाता है।
मैं सूरज से लेकर उसको वर्षा जल में मिलवाता हूँ।
जिसका जितना होता है उसको वापिस करता जाता हूँ।
उत्तर पाकर मैं लौट चला, जो पाना था वो पाया ,
सूचित करके देवजनों को मानव को भी बतलाया ;
किन्तु मानव है "श्रेष्ठ", अतः उसने कहा न माना ;
इस आपबीती घटना को उसने कविता मात्र ही माना।
अब भी लोग जीते हैं , पाप करते हैं , और हरिद्वार जाते हैं ,
और ये सोच गंगा में नहाते हैं ,
कि गंगा में नहाने से सारे पाप धुल जाते हैं
अनुपम S. "श्लोक"
anupamism@gmail.com
असर ...!!! (30 - July - 2006)
कॉल लैटर ...!!! (13-August-2003)
युवक के सामने , उसकी आँखों के लक्ष्य पर ;
मेडिकल कॉलेज के लैटर हेड पे ,
उसके प्रवेश को प्रतीक्षरत ;
विद्यालय स्तर तक सर्वश्रेस्ठ था , किन्तु शायद अब नहीं ;
क्योंकि अब जरुरत "अर्थ" कि थी ,
१२ लाख में प्रवेश बिक रहे थे ,उससे मांग १० लाख कि थी।
उसने एक पल सोचा …
कितने मिलेंगे इस मकान के??
शायद ४ लाख में बिकेगा .... और बाकी ६ लाख ??
और नज़दीक ही बहन कि शादी है।
इसी उधेरबुन में एक विचार फिर कौंधा ,
क्यों न लोन ले ले.…
कम ब्याज पे शिक्षा लोन।
१ माह भागदौड़ के बाद, १० लाख का चेक हाथ में लेकर
चेहरे पर ख़ुशी के साथ , वापिस घर पहुंचा।
आश्चर्य लड़के वाले प्रत्यक्ष थे।
लोन कि खबर उन्होंने भी सुनी थी।
और अब विवाह से १० दिन पूर्व
दहेज़ के लिए ८ लाख मांगे थे।
उनको विदा कर फिर उधेड़बुन में डूब गया वो।
अब क्या करे… दाखिला ले या दहेज़ दे दे।
बहन को देगा तो लोन कैसे वापिस करेगा ??
इसे चिंता में उसे नींद ने आ घेरा।
अगली सुबह तैयार होकर वो कहीं जा रहा था।
दबे पांव भारी मन से.… न जाने कहाँ को अग्रसारित था।
अरे !!! ये तो लड़के वालों कि गली है।
और कॉल लैटर ?????
अरे वो तो डस्टबीन में पड़ा है।
अनुपम S "श्लोक"
anupamism@gmail.com
दीपक बनाम अँधेरा ...!!! (16-01-2004)
जब तक जीवन, तब तक संघर्ष। (1-Oct-2022)
हा जीवन , तुम संघर्ष; मुझ दीन की व्यथा का व्यंग बनाते तुम , मृत्यु शैय्या पर स्वप्न दिखाते तुम , नित्य हृदय छेदन , नित्य चरित्र ह्रास, जब तक...
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तुम्हे देखता हूँ .....!(24-Mar-2008) तुम्हे देखता हूँ, और फिर तुम्हारे आसपास देखता हूँ.... हाँ नफरत करता हूँ..... बहुत नफरत करता ...
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हा जीवन , तुम संघर्ष; मुझ दीन की व्यथा का व्यंग बनाते तुम , मृत्यु शैय्या पर स्वप्न दिखाते तुम , नित्य हृदय छेदन , नित्य चरित्र ह्रास, जब तक...
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This girl had blocked me a year back when I was at home not working, saying I was a pervert, my social media posts & the way I think ha...


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